
तीजन बाई की जीवन गाथा केवल कलात्मक उत्कृष्टता का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह विपरीत परिस्थितियों पर विजय पाने के दृढ़ संकल्प की कहानी है I उनके जीवन में संघर्ष बहुआयामी रहा I एक महिला होने के नाते, और पारधी अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के कारण, उन्हें भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद, misogyny (स्त्रीद्वेष) और गरीबी के दोहरे पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा I
इसके बावजूद, उन्होंने अपने सपनों का पीछा करने का दृढ़ निश्चय रखा और पंडवानी को एक ऐसी ऊँचाई पर पहुँचाया, जहाँ से यह कला भारत की सांस्कृतिक धरोहर का एक अमूल्य हिस्सा मानी जाने लगी I
यह जीवनी लोक गायिका डॉ. तीजन बाई की संघर्षपूर्ण यात्रा का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है I इसमें उनके प्रारंभिक जीवन की कठिनाइयों, पंडवानी की ‘कापालिक शैली‘ में उनके क्रांतिकारी योगदान, पुरुषों के वर्चस्व वाली परंपराओं को तोड़ने की उनकी साहसी पहल, और उन्हें प्राप्त सर्वोच्च नागरिक सम्मानों की श्रृंखला पर सूक्ष्मता से विचार किया गया है I उनका जीवन और कला, दृढ़ता और समर्पण के बीच गहरे संबंध को उजागर करता है I
Table of Contents
तीजन बाई की प्रारंभिक जीवन, पृष्ठभूमि और प्रेरणा के बीज
तीजन बाई का जन्म और जनजातीय पहचान
तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ के भिलाई के पास स्थित गनियारी गाँव में हुआ था I उनके पिता का नाम चुन्नुक लाल परधी और माता का नाम सुखवती था, और वह अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं I उनकी पारिवारिक पहचान उनकी कला यात्रा के शुरुआती संघर्षों का केंद्र बिंदु बनी रही I वह छत्तीसगढ़ राज्य की पारधी अनुसूचित जनजाति से संबंधित थीं I कुछ स्रोतों में उन्हें भील उपसमूह से संबंधित बताया गया है I
यह आदिवासी (दलित) पृष्ठभूमि उनकी जीवनी में सामाजिक गतिशीलता के सिद्धांत को स्थापित करती है, जहाँ प्रतिभा ने जाति और गरीबी के बंधनों को तोड़कर सफलता प्राप्त की I उनका बचपन अत्यधिक अभाव और गरीबी में बीता I एक बड़ी बेटी होने के कारण, उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह घर के कामों और छोटे भाई-बहनों की देखभाल में लगी रहें I हालांकि, इस पारंपरिक अपेक्षा के विपरीत, तीजन बाई के भीतर गाने की एक तीव्र ललक थी, जिसे उन्होंने स्वयं बाद में ‘पागलपन‘ बताया I
महाकाव्य का मौखिक स्मरण
औपचारिक शिक्षा से वंचित होने के बावजूद, वह कभी स्कूल नहीं गईं I तीजन बाई ने लोक ज्ञान के माध्यम से अपनी कलात्मक नींव रखी. उनकी प्रेरणा का मुख्य स्रोत उनके नाना, ब्रजलाल परधी थे I नाना, सबल सिंह चौहान द्वारा रचित छत्तीसगढ़ी महाभारत का गायन किया करते थे I युवा तीजन बाई ने इन कथाओं को सुनकर ही याद कर लिया I
पंडवानी के मौखिक प्रदर्शन की कापालिक शैली, जो मेमोरी (‘कपाल’ या स्मृति) पर अत्यधिक निर्भर करती है, उनकी इस प्रारंभिक मौखिक स्मरण शक्ति का परिणाम थी I बाद में, उन्हें गीतकार उमेद सिंह देशमुख से अनौपचारिक मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, जिसने उनकी कला को और तराशा I
कला के मार्ग में प्रारंभिक बाधाएं और पारिवारिक विरोध
तीजन बाई का कला के प्रति जुनून पारिवारिक और सामाजिक रूप से अस्वीकार्य था I उनकी माँ, जो उनके गायन के जुनून को पारंपरिक सीमाओं का उल्लंघन मानती थीं, अक्सर उन्हें पीटती थीं I कुछ भयानक संस्मरणों के अनुसार, उनकी माँ उन्हें बंद कर देती थीं, खाना नहीं देती थीं, और कभी-कभी तो उनका गला दबाकर ‘संगीत को बाहर निकालने’ की कोशिश करती थीं I
परिवार और समुदाय का यह मजबूत विरोध उनके चरित्र की असाधारण दृढ़ता को दर्शाता है I सामान्य परिस्थितियों में, ऐसे जबरदस्त सामाजिक और पारिवारिक दबाव के कारण किसी भी बच्चे को अपनी कला का त्याग करना पड़ सकता था I लेकिन तीजन बाई ने न केवल विरोध का सामना किया, बल्कि अपनी कला के लिए जीवित रहने की लड़ाई लड़ी, जो उनके आगे के सभी संघर्षों का आधार बनी I उनका यह शुरुआती समर्पण ही पंडवानी को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने में उनके अविस्मरणीय योगदान की नींव बना I
तीजन बाई की सामाजिक और लैंगिक संघर्ष : पंडवानी में क्रांति का बीजारोपण
तीजन बाई का पेशेवर करियर सामाजिक और लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने की एक विद्रोही यात्रा के रूप में सामने आया I उन्होंने एक ऐसे कला रूप में प्रवेश किया जो सदियों से पुरुषों के लिए आरक्षित था, और ऐसा करने के लिए उन्हें अपने समाज और परिवार से भारी कीमत चुकानी पड़ी I
वैवाहिक जीवन और सामाजिक बहिष्कार
मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह कर दिया गया I विवाह के बाद, उनके पति और ससुराल वालों ने उन्हें पंडवानी गाने की अनुमति नहीं दी I लोक कला के प्रति उनका समर्पण इतना तीव्र था कि वह रात में पंडवानी के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए चुपचाप घर से निकल जाती थीं I इस ‘अस्वीकार्य‘ आचरण के कारण, उनके पति ने उन्हें घर से निकाल दिया I इससे भी अधिक कठोर दंड उन्हें अपने पारधी समुदाय से मिला, जिसने उन्हें पंडवानी गाने के लिए बहिष्कृत (expelled) कर दिया, क्योंकि वह एक महिला थीं I
समुदाय से निकाले जाने के बाद, तीजन बाई को जीवन यापन के लिए संघर्ष करना पड़ा I उन्होंने एक छोटी सी झोपड़ी बनाई और पड़ोसियों से बर्तन और भोजन उधार लेकर अकेले जीवन जीना शुरू किया I समुदाय के इस बहिष्कार का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास था , सामाजिक बाधाओं ने उन्हें रोक नहीं पाईं, बल्कि अनजाने में उन्हें अपनी कला को केवल गाँव के दायरे से बाहर निकालकर एक पेशेवर कलाकार बनने के लिए मजबूर किया I
यदि उन्हें समुदाय में पारंपरिक स्वीकृति मिल जाती, तो शायद उनका प्रदर्शन गनियारी गाँव तक ही सीमित रहता I बहिष्कृत जीवन ने उन्हें अपनी कला को सार्वजनिक मंच पर ले जाने के लिए प्रेरित किया, जिससे उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सफलता मिली I
पंडवानी में लिंग बाधाओं का टूटना
पारंपरिक रूप से, पंडवानी एक पुरुष-प्रधान कला रूप रहा है, जिसे विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता था I जब 1980 के दशक में महिलाओं ने इस कला को अपनाना शुरू किया, तब भी उन्हें वेदमती शैली के तहत बैठकर प्रदर्शन करने की अपेक्षा की जाती थी I
13 वर्ष की उम्र में, चंदखुरी गाँव में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देने के बाद, तीजन बाई ने इस नियम को तोड़ दिया I उन्होंने पुरुषों की तरह खड़े होकर, ओज और नाटकीयता के साथ पंडवानी का प्रदर्शन शुरू किया I खड़े होकर प्रदर्शन करने का यह निर्णय केवल एक शारीरिक मुद्रा नहीं था; यह पुरुष-प्रधान क्षेत्र में महिला कलाकार द्वारा अपने अधिकार और उपस्थिति पर दावा करने का एक प्रत्यक्ष और शक्तिशाली प्रतीक था I
उन्होंने न केवल पंडवानी में महारत हासिल की, बल्कि अपने प्रदर्शन से इसे महिला सशक्तिकरण के एक मंच में बदल दिया I इस साहसी कदम ने उन्हें ‘कापालिक शैली‘ अपनाने वाली पहली प्रमुख महिला कलाकार के रूप में स्थापित किया I
पंडवानी कला का सूक्ष्म विश्लेषण और कापालिक शैली की विशिष्टता
तीजन बाई की पहचान उनकी पंडवानी गायन शैली, विशेष रूप से कापालिक शैली, में निहित है, जिसने लोक कला को एक नई ऊंचाई दी है I पंडवानी, जिसका अर्थ महाभारत के पांडव भाइयों की कथाएँ है, मध्य भारत के छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के पड़ोसी क्षेत्रों में लोकप्रिय है I
पंडवानी का स्वरूप और महत्व
पंडवानी एक लोक गायन शैली है जिसमें महाकाव्य महाभारत की कहानियों का वाद्य संगत के साथ वर्णन किया जाता है I इस शैली में कथा का केंद्रीय नायक पांडवों में से भीम (शक्ति और साहस का प्रतीक) होता है I तीजन बाई के वीर, संघर्षपूर्ण और दृढ़ निश्चय वाले जीवन को देखते हुए, शक्ति और साहस के प्रतीक भीम के चरित्र पर उनका ध्यान केंद्रित करना उनके व्यक्तिगत संघर्षों को प्रतिध्वनित करता है I पंडवानी गायक/गायिका एकतारा या तांबूरा (एक तंत्री वाद्य यंत्र) और कभी-कभी करताल (झाँझ) का प्रयोग करते हैं I
तीजन बाई की ‘कापालिक शैली’
पंडवानी की दो मुख्य शैलियाँ हैं: वेदमती और कापालिक. तीजन बाई ‘कापालिक शैली‘ की विख्यात प्रतिपादक हैं I
कापालिक शैली अधिक नाटकीय, अभिनय-प्रधान और ओजपूर्ण होती है I ‘कापालिक‘ शब्द का तात्पर्य है कि यह शैली गायक की स्मृति (“कपाल”) में विद्यमान रहती है, और इसमें पाठ की सटीकता से अधिक अभिनय और चरित्र चित्रण पर बल दिया जाता है. तीजन बाई ने इस शैली के माध्यम से महाभारत के सबसे गहन और नाटकीय प्रसंगों, जैसे द्रौपदी चीरहरण, दुःशासन वध, और भीष्म-अर्जुन युद्ध, को अद्वितीय ख्याति दिलाई I
तांबूरा/एकतारा का बहुआयामी उपयोग
तीजन बाई की प्रस्तुति का एक तकनीकी चमत्कार तांबूरा का उनका अभिनव उपयोग है. उनके लिए तांबूरा सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि मंच पर उनका एकमात्र प्रॉप बन जाता है I वह इसे आसानी से पात्रों और वस्तुओं में रूपांतरित कर देती हैं. क्षण भर में यह भीम की गदा (mace) बन जाता है, अगले ही पल अर्जुन का धनुष या रथ I कभी-कभी, वह इसे महारानी द्रौपदी के केश (hair) के रूप में भी उपयोग करती हैं I
न्यूनतम संसाधनों (एक वाद्य यंत्र) का अधिकतम नाटकीय प्रभाव के लिए उपयोग करने का यह सिद्धांत उनकी रचनात्मक प्रतिभा और मंच पर उनके पूर्ण नियंत्रण को दर्शाता है. यह ‘न्यूनतमवाद’ (minimalism) उनकी कला को जटिल प्रॉप्स की आवश्यकता के बिना, विश्व के किसी भी मंच पर ले जाने योग्य बनाता है, जहाँ कहानी की शक्ति पूरी तरह से उनके अभिनय और आवाज़ की प्रामाणिकता पर टिकी रहती है.
हाव-भाव और प्रस्तुति कौशल की विशिष्टता
तीजन बाई की पहचान उनके शक्तिशाली स्वर, नाटकीय अभिव्यक्ति और भावुक चेहरे से होती है I वह केवल कहानी का गायन या वर्णन नहीं करती हैं; वह उस कहानी में खुद को पूरी तरह से डुबो देती हैं I उनकी प्रस्तुति का कौशल इतना गहरा है कि वह एक पल में भीम का चरित्र निभाती हैं, तो दूसरे ही पल द्रौपदी का I उनके हाव-भाव दर्शकों को कथा के भावनात्मक मूल से सीधे जोड़ते हैं I
उनकी कला का प्रभाव सार्वभौमिक है. हालांकि पंडवानी की जड़ें भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में हैं और भाषा मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ी है, उनके हाव-भाव, शारीरिक भाषा, और अभिव्यक्ति भाषाई बाधाओं को पार करके अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को भी मंत्रमुग्ध कर देती हैं I जर्मनी, जापान और यूरोप के दर्शकों ने बिना शब्द समझे उनकी प्रस्तुति की शक्ति महसूस की है, यह पंडवानी की कथा संरचना और उनके अभिनय कौशल की शक्ति का प्रमाण है, जो उन्हें केवल एक लोक गायक नहीं, बल्कि एक विश्व स्तरीय कथाकार बनाता है.
पंडवानी की शैलियाँ: वेदमती और कापालिक
| विशेषता | कापालिक शैली (तीजन बाई द्वारा प्रचलित) | वेदमती शैली |
| प्रस्तुति का तरीका | अत्यधिक नाटकीय, अभिनय-प्रधान (Vigorous and dramatic). कलाकार खड़े होकर ओजपूर्ण प्रदर्शन करता है । | अधिक शांत, कथावाचन और गायन पर अधिक जोर। कलाकार बैठकर प्रदर्शन कर सकते हैं। |
| नाम का अर्थ | ‘कापालिक’ (मेमोरी/कपाल पर निर्भर) । | ‘वेदमती’ (वेद, पाठ और ज्ञान की पवित्रता पर जोर) । |
| अभिनय उपकरण | तांबूरा/एकतारा का प्रयोग विभिन्न प्रॉप्स (गदा, धनुष) के रूप में । | वाद्य यंत्र का उपयोग मुख्य रूप से संगीत संगत के लिए। |
तीजन बाई की राष्ट्रीय पहचान और वैश्विक मंच पर छत्तीसगढ़ का गौरव
तीजन बाई की यात्रा गनियारी गाँव से शुरू होकर विश्व मंच तक पहुँची, जिससे पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व वैधता और लोकप्रियता मिली I
दिल्ली का आह्वान और प्रारंभिक राष्ट्रीय मान्यता
उनकी कला को पहली बड़ी पहचान तब मिली जब उनकी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति के तुरंत बाद, प्रसिद्ध रंगकर्मी औरनाटककार हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना I स्थानीय समुदाय द्वारा बहिष्कार और पूर्वाग्रह का सामना कर रही तीजन बाई के लिए राष्ट्रीय अभिजात वर्ग (elite) से यह मान्यता प्राप्त करना आवश्यक था I
तनवीर के आमंत्रण पर, तीजन बाई ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष प्रदर्शन किया I चूंकि उनकी कला को उनके अपने समुदाय में ‘अस्वीकार्य’ माना गया था, राष्ट्रीय राजधानी और प्रधानमंत्री से मिली स्वीकृति ने उनकी कला को तुरंत आधिकारिक और सम्मानजनक दर्जा दिया, जिससे उनके संघर्ष को वैधता मिली और उनके खिलाफ विरोध कम हुआ. यह प्रदर्शन उनके करियर के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय लॉन्चपैड बन गया I
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दृश्य माध्यम में कला का प्रसार
उनकी प्रसिद्धि को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित करने में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने श्याम बेनेगल की बहुचर्चित दूरदर्शन टीवी श्रृंखला भारत एक खोज (Bharat Ek Khoj), जो जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक पर आधारित थी, में महाभारत के प्रसंगों का प्रदर्शन किया I इस दृश्य माध्यम ने उन्हें रातोंरात पूरे देश में एक घरेलू नाम बना दिया, जिससे पंडवानी और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को व्यापक राष्ट्रीय पहचान मिली.
अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक राजदूत
1980 के दशक की शुरुआत से, तीजन बाई ने एक सांस्कृतिक राजदूत के रूप में व्यापक रूप से यात्रा की I उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की, ट्यूनीशिया, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस जैसे दूरदराज के देशों में अपनी प्रस्तुति दी I
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उनकी सफलता ने यह साबित किया कि लोक कला और कथाएँ भाषाई और सांस्कृतिक सीमाओं को पार कर सकती हैं I अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों द्वारा उनकी कला को समझने और सराहे जाने का कारण उनकी प्रस्तुति की सार्वभौमिकता थी I उनके शक्तिशाली हाव-भाव और नाटकीयता ने कहानी के भावनात्मक मूल को सीधे संवादित किया, जिससे वैश्वीकरण के दौर में भी स्थानीय भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता स्थापित हुई I
फुकुओका पुरस्कार (2018)
उनकी वैश्विक पहचान को 2018 में जापान में प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार (Fukuoka Prize) द्वारा और मजबूती मिली I यह उनके जीवन की पहली बड़ी अंतर्राष्ट्रीय औपचारिक मान्यता थी I फुकुओका में, जापानी प्रोफेसरों और विशेषज्ञों ने उनकी कला और पंडवानी के ऐतिहासिक, भौगोलिक और महाकाव्यीय बारीकियों पर चर्चा की I इस विद्वतापूर्ण स्वीकृति ने उनकी कला को केवल ‘देहाती मनोरंजन‘ से ऊपर उठाकर, एक गहरी सांस्कृतिक अध्ययन की विषय वस्तु के रूप में स्थापित किया I
नोट : “जापान की फुकुओका पुरस्कार (Fukuoka Prize), भारत की पद्म भूषण के सामान है I”
सम्मान की सर्वोच्च श्रृंखला: पद्म पुरस्कारों का विश्लेषण
तीजन बाई को प्राप्त सम्मानों की श्रृंखला उनके कलात्मक उत्कृष्टता और भारतीय संस्कृति के संरक्षण में उनके अपरिहार्य योगदान का स्पष्ट प्रमाण है I उन्हें तीन पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जो किसी भी भारतीय कलाकार के लिए सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है, और यह तथ्य उन्हें किसी भी शास्त्रीय कलाकार के समकक्ष स्थापित करता है I
प्रारंभिक और राष्ट्रीय मान्यता (1987-1995)
तीजन बाई को सबसे पहले भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया. यह सम्मान 1987 या 1988 में प्रदान किया गया था I यह उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने उन्हें आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय मुख्यधारा के कलाकारों में शामिल किया I इसके बाद, उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ, जो भारत की राष्ट्रीय संगीत, नृत्य और नाटक अकादमी द्वारा प्रदर्शन कलाओं में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है I
पद्म भूषण (2003)
उनकी कलात्मक यात्रा की निरंतर बढ़ती स्वीकृति को देखते हुए, उन्हें 2003 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया I
पद्म विभूषण (2019)
वर्ष 2019 में, तीजन बाई को भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया I यह सम्मान प्राप्त करने वाली वह छत्तीसगढ़ की पहली महिला बनीं I सम्मानों की यह श्रृंखला दर्शाती है कि उनके योगदान का मूल्यांकन दशकों तक लगातार बढ़ा है, जो उनकी कला को एक क्षणिक लोक प्रवृत्ति के बजाय एक स्थायी और राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्थापित करता है I
मानद शैक्षणिक उपाधियाँ (तीजन बाई से डॉ. तीजन बाई )
यह उल्लेखनीय है कि औपचारिक शिक्षा की कमी के बावजूद (उन्हें अक्सर ‘5वीं फेल‘ के रूप में संदर्भित किया जाता है ), तीजन बाई को कला के क्षेत्र में उनके विशाल ज्ञान और योगदान के लिए कई मानद डॉक्टरेट उपाधियों से सम्मानित किया गया I उन्हें 2003 में बिलासपुर विश्वविद्यालय से और 2017 में खैरागढ़ यूनिवर्सिटी से डी.लिट. (मानद डॉक्टरेट) की उपाधि प्रदान की गई I यह तथ्य औपचारिक साक्षरता और पारंपरिक मौखिक ज्ञान के बीच सेतु बनाता है. उनकी उपाधियाँ इस विचार को पुष्ट करती हैं कि ‘ज्ञान’ सिर्फ स्कूल की किताबों तक सीमित नहीं है, और मौखिक परंपराओं की विशेषज्ञता को आधुनिक विश्वविद्यालय प्रणाली द्वारा सर्वोच्च सम्मान देना सांस्कृतिक अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण प्रमाण है I
डॉ. तीजन बाई के प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान (1987-2019)
| पुरस्कार का नाम | प्रदान करने वाला निकाय | वर्ष | महत्व/टिप्पणी |
| पद्म श्री | भारत सरकार | 1987/1988 | चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान। |
| संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार | संगीत नाटक अकादमी | 1995 | प्रदर्शन कलाओं के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार। |
| पद्म भूषण | भारत सरकार | 2003 | तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान। |
| मानद डी.लिट. | बिलासपुर विश्वविद्यालय | 2003 | कलात्मक ज्ञान की शैक्षणिक स्वीकृति। |
| मानद डी.लिट. | खैरागढ़ यूनिवर्सिटी | 2017 | औपचारिक शिक्षा के बिना प्राप्त डॉक्टरेट उपाधि। |
| फुकुओका पुरस्कार | फुकुओका, जापान | 2018 | एशिया की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मान। |
| पद्म विभूषण | भारत सरकार | 2019 | भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान। |
तीजन बाई की विरासत, सामाजिक प्रभाव और वर्तमान चुनौतियाँ
तीजन बाई का प्रभाव पंडवानी मंच से कहीं अधिक व्यापक है I उन्होंने कला के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की मिसाल पेश की है और लोक परंपराओं के भविष्य को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है I
लोक कला के संरक्षण और शिक्षा में भूमिका
एक विश्व-प्रसिद्ध कलाकार होने के साथ-साथ, तीजन बाई एक समर्पित गुरु भी हैं I वह आज भी पंडवानी की परंपरा को नई पीढ़ियों, विशेष रूप से महिला कलाकारों को, सिखाने का कार्य कर रही हैं I उनका शिक्षण यह सुनिश्चित करता है कि पंडवानी, जिसे उन्होंने जेंडर-न्यूट्रल बनाया, आने वाली पीढ़ियों की महिला कलाकारों द्वारा आगे बढ़ाया जाएगा I
वह लोक परंपराओं के संरक्षण की एक प्रबल पक्षधर रही हैं I उनका मत है कि वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के दौर में स्वदेशी संस्कृतियों को जीवित रखना आवश्यक है I इस प्रकार, वह केवल एक कलाकार नहीं हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ी संस्कृति की ध्वजवाहक (flag bearer) बनी हुई हैं I उनकी विरासत उस सांस्कृतिक पुल को बनाने में निहित है, जिसके माध्यम से एक हाशिए की परंपरा को पुनर्जीवित और संरक्षित किया जाता है I
दलित और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक
तीजन बाई की जीवन यात्रा दलितों और महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का एक शक्तिशाली प्रतीक है I उन्होंने अपनी यात्रा के माध्यम से यह साबित किया कि कैसे एक आदिवासी महिला, गरीबी, निरक्षरता, जातिवाद और पुरुष वर्चस्व जैसी बाधाओं को तोड़कर अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना सकती है I
उनकी कहानी उन युवाओं को विशेष प्रेरणा देती है जो अपनी जड़ों से कटे हुए महसूस करते हैं I उनकी कला और जीवन युवाओं को अपने ‘जोड़ों से जुड़े रहने’ और अपने सपनों को पूरा करने के लिए ‘सूरज की तरह जलने‘ के लिए प्रेरित करते हैं. पंडवानी में उनके प्रवेश ने न केवल एक पुरुष-प्रधान क्षेत्र में महिलाओं के लिए रास्ते खोले, बल्कि ग्रामीण और हाशिए के कलाकारों के लिए राष्ट्रीय मंच तक पहुँचने की संभावनाओं को भी बढ़ाया I
तीजन बाई की स्वास्थ्य और आर्थिक संघर्ष (2023 के बाद)
उनके सर्वोच्च सम्मान और वैश्विक ख्याति के बावजूद, तीजन बाई का बाद का जीवन चुनौतीपूर्ण रहा I वर्ष 2023 उनके लिए विशेष रूप से दर्दनाक था, जब उन्हें लकवा (paralysis) की गंभीर बीमारी हुई और साथ ही उनके छोटे बेटे का निधन भी हो गया I
विडंबना यह है कि भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान (पद्म विभूषण) से सम्मानित कलाकार होने के बावजूद, बीमारी के दौरान उन्हें अपनी पेंशन नहीं मिलने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें जीवन यापन करना मुश्किल हो गया I वह बिस्तर पर पड़ी रहने और अपने बेटे-बहू के आश्रय में जीवन बिताने को मजबूर थीं I यह घटना भारतीय कला जगत में प्रतिभाशाली लोक कलाकारों के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा और पेंशन योजनाओं की कमी को उजागर करती है I यदि देश के सर्वोच्च सम्मानित कलाकार को आर्थिक बेबसी का सामना करना पड़े, तो यह दर्शाता है कि कला के संरक्षण की हमारी प्रणाली वित्तीय सहायता की तुलना में प्रतीकात्मक सम्मान को अधिक महत्व देती है I मीडिया में लगातार खबरें आने के बाद ही शासन-प्रशासन ने उनकी सुध ली, सहायता राशि देने के साथ-साथ उनकी पेंशन को भी बहाल कराया I
निष्कर्ष: कला, संघर्ष और समर्पण का महाकाव्य
डॉ. तीजन बाई की जीवनी लोक कला की शक्ति, व्यक्तिगत दृढ़ संकल्प और सामाजिक रूढ़ियों पर विजय की एक असाधारण गाथा है I उन्होंने पंडवानी को एक नई ऊँचाई दी, उसे पुरुषों के एकाधिकार से निकालकर वैश्विक पहचान दिलाई I उनकी ‘कापालिक शैली‘ ने अभिनय, ऊर्जा और कथावाचन को मिलाकर एक ऐसा प्रदर्शन रूप बनाया जो भाषाई और सांस्कृतिक सीमाओं को पार करने में सक्षम है I
अपने पूरे जीवन में, चाहे वह गरीबी हो, पारिवारिक अस्वीकृति हो, या सामुदायिक बहिष्कार तीजन बाई ने कभी अपनी कला का त्याग नहीं किया I उनकी सफलता ने हाशिए के समुदायों और महिलाओं के लिए कला के माध्यम से सामाजिक गतिशीलता का मार्ग प्रशस्त किया I पद्म श्री (1987/1988) से लेकर पद्म विभूषण (2019) तक के उनके सम्मानों की श्रृंखला कलात्मक उत्कृष्टता का सर्वोच्च प्रमाण है I
हालांकि, उनके जीवन का अंतिम संघर्ष, जिसमें उन्हें बीमारी और आर्थिक बेबसी का सामना करना पड़ा I यह याद दिलाता है कि कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए केवल प्रतीकात्मक सम्मान ही काफी नहीं है, बल्कि मजबूत सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्रों की भी आवश्यकता है I डॉ. तीजन बाई आज भी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की ध्वजवाहक बनी हुई हैं, और उनकी कला की गूँज भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर बनी रहेगी I
Refrences :-
- https://en.wikipedia.org/wiki/Teejan_Bai
- https://indianculture.gov.in/intangible-cultural-heritage/performing-arts/teejan-bai
- https://fukuoka-prize.org/en/laureates/detail/ee9492c5-06c3-4702-af74-7a2c2d824e13
- https://pantheon.world/profile/person/Teejan_Bai
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: तीजन बाई किस लोक कला से जुड़ी हैं?
डॉ. तीजन बाई छत्तीसगढ़ की लोक गायन शैली ‘पंडवानी’ की विख्यात कलाकार हैं I पंडवानी महाभारत की कथाओं का गायन और नाटकीय वर्णन है, जो मध्य भारत में अत्यधिक लोकप्रिय है I
Q2: पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ क्या है?
कापालिक शैली पंडवानी की एक नाटकीय शैली है जो गायक की स्मृति (‘कपाल’) पर निर्भर करती है और इसमें विस्तृत अभिनय और ओजपूर्ण, खड़े होकर की जाने वाली प्रस्तुति शामिल होती है I तीजन बाई इस शैली की प्रमुख प्रतिपादक हैं, जो इसे पारंपरिक ‘वेदमती‘ शैली से अलग करती है I
Q3: तीजन बाई को पद्म विभूषण कब मिला?
डॉ. तीजन बाई को 2019 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया I इसके अलावा, उन्हें 1987/1988 में पद्म श्री और 2003 में पद्म भूषण भी प्राप्त हुआ I
Q4: पंडवानी में कौन से वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है?
पंडवानी में मुख्य रूप से एकतारा या तांबूरा (stringed musical instrument) का प्रयोग किया जाता है I तीजन बाई इस तांबूरे का प्रयोग भीम की गदा या अर्जुन के धनुष जैसे विभिन्न प्रॉप्स के रूप में करती हैं, जिससे प्रदर्शन में नाटकीयता आती है I
Q5: तीजन बाई पंडवानी गाने वाली पहली महिला क्यों कहलाती हैं?
पंडवानी परंपरागत रूप से पुरुषों द्वारा किया जाता था. तीजन बाई पहली प्रमुख महिला कलाकार थीं जिन्होंने इस पुरुष-प्रधान परंपरा को तोड़ते हुए, पुरुषों की तरह खड़े होकर ओजपूर्ण प्रदर्शन करना शुरू किया और कापालिक शैली को अपनाया I उन्होंने अपनी कला के माध्यम से लैंगिक बाधाओं को तोड़ा और पंडवानी को महिला सशक्तिकरण के एक मंच में बदल दिया I
Q6: तीजन बाई, डॉ. तीजन बाई कैसे बनी ?
तीजन बाई को अक्सर उनकी औपचारिक शिक्षा की कमी के कारण ‘5वीं फेल‘ के रूप में संदर्भित किया जाता था I इसके बावजूद तीजन बाई को कला के क्षेत्र में उनके विशाल ज्ञान और योगदान के लिए कई मानद डॉक्टरेट उपाधियों से सम्मानित किया गया I उन्हें 2003 में बिलासपुर विश्वविद्यालय से और 2017 में खैरागढ़ यूनिवर्सिटी से डी.लिट. (मानद डॉक्टरेट) की उपाधि प्रदान की गई I तब से वे डॉ. तीजन बाई कहलाये जाने लगी I










