
भारत की सांस्कृतिक विविधता में लोक कलाओं का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कलाएँ न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि वे जनमानस की आस्था, संघर्ष और इतिहास की जीवित दस्तावेज भी हैं।
छत्तीसगढ़, जिसे मध्य भारत का ‘धान का कटोरा‘ कहा जाता है, अपनी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और सतनामी संप्रदाय की परंपराओं के लिए विश्व विख्यात है। इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक पटल पर स्थापित करने में जिस एक व्यक्तित्व का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, वे हैं—स्वर्गीय देवदास बंजारे।
यह शोध प्रतिवेदन देवदास बंजारे के जीवन, उनकी कला और उनके सामाजिक प्रभाव का एक विस्तृत और गहन विश्लेषण है। यह रिपोर्ट उनके प्रारंभिक जीवन, एक कबड्डी खिलाड़ी से एक विश्व प्रसिद्ध नर्तक बनने की उनकी यात्रा, और पंथी नृत्य में उनके द्वारा किए गए क्रांतिकारी प्रयोगों का दस्तावेजीकरण करती है।
हम यह भी विश्लेषण करेंगे कि कैसे उन्होंने हबीब तनवीर और श्याम बेनेगल जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर लोक कला को समकालीन रंगमंच और सिनेमा के साथ एकीकृत किया।
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प्रस्तावना: छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक भूगोल और सतनामी अस्मिता
देवदास बंजारे के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए, उस भूमि और समाज को समझना आवश्यक है जिसने उन्हें गढ़ा। छत्तीसगढ़ राज्य, जो प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था, वनों, नदियों और खनिजों से संपन्न एक भू-भाग है। यहाँ की संस्कृति में सामूहिकता और प्रकृति प्रेम की प्रधानता है। इसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में सतनामी पंथ का उदय हुआ, जिसने देवदास बंजारे जैसी प्रतिभा को जन्म दिया।
सतनामी संप्रदाय: प्रतिरोध और भक्ति की जड़ें
सतनामी संप्रदाय की स्थापना 19वीं शताब्दी की शुरुआत में महान समाज सुधारक गुरु घासीदास जी ने की थी । यह आंदोलन तत्कालीन समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत और मूर्तिपूजा के विरुद्ध एक सशक्त विद्रोह था। गुरु घासीदास ने ‘सतनाम‘ (सत्य ही ईश्वर है) का संदेश दिया और समाज के शोषित व दलित वर्गों को एक सूत्र में पिरोया। उन्होंने ‘जैतखाम‘ (श्वेत विजय स्तंभ) को सत्य और अटल विश्वास के प्रतीक के रूप में स्थापित किया ।
देवदास बंजारे इसी सतनामी समाज की उपज थे। उनका नृत्य केवल शारीरिक क्रिया नहीं थी, बल्कि यह उनके समुदाय के इतिहास, पीड़ा और आध्यात्मिक उत्कर्ष की अभिव्यक्ति थी। पंथी नृत्य, जो सतनामी समाज का प्रमुख अनुष्ठान है, गुरु घासीदास की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाने का एक माध्यम है। बंजारे ने इस पारंपरिक अनुष्ठान को एक वैश्विक कला रूप में परिवर्तित कर दिया, बिना इसकी मूल आत्मा से समझौता किए।
पंथी नृत्य का समाजशास्त्र और महत्व
‘पंथी‘ शब्द की उत्पत्ति ‘पंथ’ से हुई है, जिसका अर्थ है—रास्ता या मार्ग। यह सत्य के मार्ग पर चलने वाले अनुयायियों का नृत्य है । पारंपरिक रूप से माघ पूर्णिमा (गुरु घासीदास जी की जयंती) के अवसर पर किया जाने वाला यह नृत्य, दलित चेतना और आत्म-सम्मान का प्रतीक है।
इस नृत्य में नर्तक जैतखाम के चारों ओर गोलाकार मुद्रा में नृत्य करते हैं। यह गोलाकार संरचना ब्रह्मांड की अनंतता और सामुदायिक एकता का प्रतिनिधित्व करती है। नर्तक अपने गुरु की स्तुति में गीत गाते हैं, जो अक्सर निर्गुण भक्ति धारा से प्रभावित होते हैं।
देवदास बंजारे ने इस नृत्य को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखा; उन्होंने इसमें एक ऐसी ऊर्जा और अनुशासन का समावेश किया जिसने इसे दुनिया भर के दर्शकों को सम्मोहित कर दिया। उनके लिए पंथी, दलितों और शोषितों के आत्म-सम्मान को पुनः प्राप्त करने का एक सशक्त माध्यम था ।
देवदास बंजारे: जीवन परिचय और पारिवारिक पृष्ठभूमि
देवदास बंजारे का जन्म और प्रारंभिक जीवन: तिथियों का द्वंद्व और यथार्थ
देवदास बंजारे के जन्म वर्ष को लेकर ऐतिहासिक दस्तावेजों में कुछ विरोधाभास देखने को मिलता है, जो भारतीय लोक कलाकारों के दस्तावेजीकरण में एक सामान्य समस्या रही है। कुछ स्रोत, जिनमें छत्तीसगढ़ शासन संस्कृति विभाग की वेबसाइट शामिल है, उनका जन्म 1 जनवरी 1947 बताते हैं ।
हालाँकि, उनके समकालीनों के कथन, उनके करियर की लंबाई और 1972-75 में प्राप्त पुरस्कारों के समय उनकी परिपक्वता को देखते हुए, कई अन्य विश्वसनीय स्रोत और शैक्षिक सामग्री उनका जन्म 1 जनवरी 1937 मानते हैं । इस रिपोर्ट में विश्लेषण के उद्देश्य से 1937 को अधिक तार्किक माना जा सकता है, क्योंकि यह उनके 30 साल के लंबे करियर और 2005 में उनकी मृत्यु के समय उनकी आयु (68 वर्ष) के साथ अधिक सामंजस्य स्थापित करता है।
उनका जन्म धमतरी जिले (तत्कालीन रायपुर जिला, मध्य प्रदेश) के सांकरा (या सोकरा) गाँव में हुआ था । यह क्षेत्र अपनी ग्रामीण सरलता और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है।
देवदास बंजारे का पारिवारिक ताना-बाना और सामाजिक परिवेश
देवदास बंजारे का पारिवारिक जीवन ग्रामीण भारतीय समाज की जटिल और सहयोगी संरचना का उदाहरण है। उनके जैविक पिता का नाम श्री बोधराम गेंद्रे था । हालाँकि, नियति ने उन्हें एक अलग दिशा दी, और उनका पालन-पोषण श्री फूल सिंह बंजारे ने किया, जो उनके दत्तक या पालक पिता बने । देवदास ने अपने पालक पिता के उपनाम ‘बंजारे‘ को अपनाया और उसे विश्व विख्यात कर दिया। उनकी माता का नाम श्रीमती भगवती बाई था ।
उनका बचपन और बाद का जीवन दुर्ग जिले के धनोरा गाँव (उतई पुलिस थाना क्षेत्र) में बीता । यह क्षेत्र भिलाई इस्पात संयंत्र के निकट था, जिसने बाद में उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका विवाह श्रीमती रामबाई बंजारे से हुआ, और उनके दो पुत्र—श्री दिलीप कुमार बंजारे और श्री संतोष कुमार बंजारे—हुए । प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचने के बावजूद, बंजारे ने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। वे अपने संयुक्त परिवार के साथ गाँव में ही रहे, जो यह दर्शाता है कि उनकी कला उनके जीवन जीने के तरीके से अलग नहीं थी।
| श्रेणी | विवरण |
| नाम | देवदास बंजारे |
| जन्म तिथि | 1 जनवरी 1937 (सर्वाधिक मान्य) / 1 जनवरी 1947 |
| जन्म स्थान | सांकरा, जिला धमतरी, छत्तीसगढ़ |
| जैविक पिता | श्री बोधराम गेंद्रे |
| पालक पिता | श्री फूल सिंह बंजारे |
| माता | श्रीमती भगवती बाई |
| पत्नी | श्रीमती रामबाई बंजारे |
| संतान | दिलीप कुमार बंजारे, संतोष कुमार बंजारे |
| मृत्यु | 26 अगस्त 2005 (सड़क दुर्घटना) |
देवदास बंजारे का खेल से कला की ओर एक युगांतरकारी परिवर्तन
देवदास बंजारे का नर्तक बनना पूर्व-नियोजित नहीं था, बल्कि यह नियति का एक खेल था। उनके जीवन का यह अध्याय सबसे अधिक प्रेरणादायक है क्योंकि यह मानव की अनुकूलन क्षमता (adaptability) को प्रदर्शित करता है।
कबड्डी का मैदान: अनुशासन की प्रथम पाठशाला
अपनी युवावस्था में, देवदास बंजारे एक प्रतिभाशाली कबड्डी खिलाड़ी थे । कबड्डी एक ऐसा खेल है जो न केवल शारीरिक शक्ति की मांग करता है, बल्कि इसमें सांस पर नियंत्रण (cant), त्वरित निर्णय क्षमता, और अदम्य साहस की आवश्यकता होती है। एक रेडर के रूप में विपक्षी पाले में जाना और सुरक्षित वापस आना, या एक डिफेंडर के रूप में आक्रमणकारी को पकड़ना—इन क्रियाओं ने बंजारे के शरीर को गठीला, लचीला और विस्फोटात्मक ऊर्जा से भर दिया।
‘ट्विस्ट ऑफ फेट’: चोट और नया मार्ग
कहा जाता है कि “जहाँ एक दरवाजा बंद होता है, वहाँ दूसरा खुल जाता है।” बंजारे के साथ भी ऐसा ही हुआ। एक मैच के दौरान उन्हें गंभीर चोट लगी, जिसके कारण उन्हें कबड्डी खेलना छोड़ना पड़ा । एक खिलाड़ी के लिए, जो अपनी शारीरिक क्षमता पर गर्व करता हो, यह एक बड़ा आघात था। लेकिन बंजारे ने हार नहीं मानी। उन्हें अपने शरीर की ऊर्जा को व्यक्त करने के लिए एक नए माध्यम की आवश्यकता थी।
इसी समय वे पंथी नृत्य के संपर्क में आए। उन्होंने महसूस किया कि पंथी नृत्य में भी उतनी ही “शक्ति और जोश” (strength and vigour) की आवश्यकता है जितनी कबड्डी में । उन्होंने अपनी खिलाड़ी की मानसिकता को नर्तक की साधना में बदल दिया। उन्होंने कठोर अभ्यास करना शुरू किया और अपने शरीर को इस तरह तैयार किया कि वह नृत्य की कठिन मुद्राओं को सहजता से कर सके। इस प्रकार, कबड्डी के मैदान का अनुशासन पंथी के घेरे में स्थानांतरित हो गया, जिसने ‘बंजारे शैली‘ की नींव रखी।
पंथी नृत्य का पुनर्विकास: बंजारे शैली का विश्लेषण
देवदास बंजारे को आधुनिक पंथी नृत्य का “पायनियर” (अग्रदूत) कहा जाता है । उन्होंने पारंपरिक लोक नृत्य को एक व्यवस्थित और तकनीकी रूप से उन्नत कला में बदल दिया।
शारीरिक वास्तुकला और मानव पिरामिड
देवदास बंजारे की सबसे विशिष्ट देन पंथी नृत्य में एक्रोबेटिक्स (कलाबाजी) और मानव पिरामिडों का समावेश था। पारंपरिक रूप से पंथी एक भक्ति नृत्य था, लेकिन बंजारे ने इसमें हैरतअंगेज शारीरिक करतब जोड़े।
- पिरामिड निर्माण: बंजारे के निर्देशन में, नर्तक एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर ऊंचे पिरामिड बनाते थे। यह केवल संतुलन का खेल नहीं था; यह सतनामी समाज की एकजुटता और ऊंचाइयों को छूने की उनकी आकांक्षा का प्रतीक था। पिरामिड के शीर्ष पर स्थित नर्तक अक्सर गुरु घासीदास का जयघोष करता था, जो दर्शकों में रोमांच भर देता था ।
- गति और लय: बंजारे की शैली में नृत्य की गति (tempo) का विशेष महत्व था। प्रदर्शन की शुरुआत धीमी गति से, गुरु वंदना के साथ होती थी। जैसे-जैसे मृदंग और झांझ की लय तेज होती, नर्तकों की गति भी बढ़ती जाती। अंत में, यह एक उन्मादपूर्ण चरमोत्कर्ष (crescendo) पर पहुँचता, जहाँ नर्तक तेज गति से घूमते हुए भी पूर्ण संतुलन बनाए रखते थे। यह ‘सर्कल’ से ‘पिरामिड’ और फिर वापस ‘सर्कल‘ में आने की प्रक्रिया अत्यंत सुचारु होती थी ।
मुद्राएँ और भाव-भंगिमाएँ
बंजारे ने नृत्य में विशिष्ट मुद्राओं को संहिताबद्ध (codify) किया। उनके द्वारा प्रचलित प्रमुख मुद्राएँ निम्नलिखित थीं:
- जय स्तंभ (Jai Stambh): यह मुद्रा सतनामी धर्म के प्रतीक ‘जैतखाम‘ की नकल करती है। इसमें नर्तक अपने शरीर को सीधा और तना हुआ रखते हैं, जो सत्य की अडिगता को दर्शाता है।
- धरती प्रणाम (Dharti Pranam): यह मुद्रा पृथ्वी के प्रति सम्मान व्यक्त करती है। इसमें नर्तक झुककर या लेटकर धरती को नमन करते हैं, जो उनकी कृषक पृष्ठभूमि और मिट्टी से जुड़ाव को दर्शाता है ।
- फूल अर्पण (Phool Arpan): इस मुद्रा में नर्तक सांकेतिक रूप से अपने गुरु और ईश्वर को फूल अर्पित करते हैं। यह भक्ति भाव की पराकाष्ठा होती है ।
वेशभूषा और सौंदर्यशास्त्र
देवदास बंजारे ने पंथी नर्तकों की वेशभूषा में एकरूपता और सादगी पर जोर दिया, जो सतनामी पंथ के श्वेत वस्त्रों के सिद्धांत के अनुरूप थी।
- वस्त्र: नर्तक आमतौर पर सफेद धोती और बनियान या कुर्ते में होते थे। सफेद रंग शांति और सत्य का प्रतीक है।
- आभूषण: उनके गले में तुलसी की कंठी माला होती थी, जो कबीरपंथ और वैष्णव परंपरा के प्रभाव को दिखाती है। पैरों में भारी घुंघरू होते थे, जो वाद्ययंत्रों के साथ ताल मिलाकर एक अद्भुत ध्वनि उत्पन्न करते थे।
- न्यूनतमवाद (Minimalism): बंजारे ने अनावश्यक चमक-दमक से परहेज किया। उनका मानना था कि नर्तक का कौशल और उसकी ऊर्जा ही उसका सबसे बड़ा आभूषण है। सादी वेशभूषा में नर्तकों की कसी हुई मांसपेशियां और उनके पसीने से लथपथ शरीर उनकी मेहनत और समर्पण को और अधिक उजागर करते थे।
संगीत पक्ष
बंजारे के दल का संगीत पक्ष भी उतना ही सशक्त था।
- मांदर (Mandar): यह मृदंग जैसा अवनद्ध वाद्य है, जो नृत्य की धड़कन है। बंजारे अक्सर मांदर की थाप पर ही नृत्य की दिशा और गति बदलते थे 1।
- झांझ (Cymbal): झांझ की तीखी और गूंजती हुई ध्वनि नर्तकों में ऊर्जा का संचार करती थी।
- गीत: गीत मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ी बोली में होते थे, जिनमें गुरु घासीदास की महिमा, कबीर के दोहे, और सामाजिक सुधार के संदेश होते थे। बंजारे स्वयं भी एक अच्छे गायक थे और उनका मानना था कि गीत के भावों को नृत्य के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचाना ही कलाकार का धर्म है ।
देवदास बंजारे का व्यावसायिक जीवन
स्वतंत्र भारत में नेहरूवादी औद्योगीकरण ने न केवल इस्पात का निर्माण किया, बल्कि संस्कृति को भी संरक्षण दिया। भिलाई इस्पात संयंत्र (Bhilai Steel Plant – BSP) इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, और देवदास बंजारे इसके सबसे चमकदार सितारे थे।
देवदास बंजारे की बीएसपी (BSP) में भूमिका
देवदास बंजारे भिलाई इस्पात संयंत्र के शिक्षा विभाग में नृत्य शिक्षक (Dance Teacher) के रूप में कार्यरत थे । यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है क्योंकि उस समय लोक कलाकारों के लिए नियमित आय का स्रोत होना दुर्लभ था। बीएसपी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपनी कला को विकसित करने के लिए आवश्यक आर्थिक सुरक्षा और मंच प्रदान किया।
बीएसपी के सहयोग से, बंजारे ने अपने नृत्य समूह को एक पेशेवर ट्रूप (troupe) के रूप में संगठित किया। उन्होंने लगभग दो दशकों तक बीएसपी का नाम रोशन किया । एक शिक्षक के रूप में, उन्होंने स्कूली बच्चों को पंथी नृत्य सिखाया, जिससे यह कला केवल एक जाति विशेष तक सीमित न रहकर व्यापक समाज तक पहुँची। उन्होंने अपनी शिक्षण पद्धति (pedagogy) विकसित की, जिससे नए नर्तकों को प्रशिक्षित करना आसान हो गया।
देवदास बंजारे का रंगमंच और सिनेमा का संगम: हबीब तनवीर और श्याम बेनेगल के साथ
देवदास बंजारे का प्रभाव केवल लोक नृत्यों के उत्सवों तक सीमित नहीं था; उन्होंने आधुनिक भारतीय रंगमंच और समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
हबीब तनवीर और ‘नया थियेटर’
प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को लेकर ‘नया थियेटर‘ की स्थापना की थी। उनकी पारखी नजर ने देवदास बंजारे की प्रतिभा को पहचाना। तनवीर का मानना था कि लोक कलाकारों में जो “विशिष्ट जीवन शक्ति” (distinctive vitality) होती है, वह शहरी अभिनेताओं में दुर्लभ है ।
बंजारे ने हबीब तनवीर के नाटकों में अभिनय और नृत्य किया। उनका जुड़ाव इतना गहरा था कि वे नया थियेटर के साथ कई देशों के दौरे पर गए। इस सहयोग ने पंथी नृत्य को एक नाटकीय संदर्भ (theatrical context) प्रदान किया। अब यह नृत्य केवल मैदानों में नहीं, बल्कि प्रोसोनियम थियेटर के मंच पर भी अपनी कहानी कह रहा था।
‘चरणदास चोर’ (1975): सेल्यूलॉयड पर अमर
श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित और हबीब तनवीर के नाटक पर आधारित फिल्म ‘चरणदास चोर’ (1975) भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इस फिल्म में देवदास बंजारे की भूमिका और उनके द्वारा निर्देशित पंथी नृत्य का दृश्य अत्यंत महत्वपूर्ण है ।
- नृत्य का प्रभाव: फिल्म समीक्षकों ने नोट किया कि बंजारे के नृत्य की ऊर्जा “नाटक में व्याप्त” (permeated the play) हो जाती थी । फिल्म में, पंथी नर्तकों का समूह एक प्रकार के ‘कोरस’ (Chorus) की तरह कार्य करता है, जो कहानी की नैतिकता और पात्रों की आंतरिक उथल-पुथल पर टिप्पणी करता है।
- प्रामाणिकता: श्याम बेनेगल ने बंजारे के नृत्य को ‘बॉलीवुड‘ शैली में नहीं बदला, बल्कि उसे उसके मूल, कच्चे और शक्तिशाली रूप में ही फिल्माया। यह फिल्म आज भी बंजारे की कला का सबसे जीवंत दस्तावेज है, जिसे देखकर नई पीढ़ी उनकी ऊर्जा को महसूस कर सकती है।
वैश्विक क्षितिज पर छत्तीसगढ़: एक सांस्कृतिक राजदूत
देवदास बंजारे संभवतः छत्तीसगढ़ के पहले लोक कलाकार थे जिन्होंने सही अर्थों में ‘ग्लोबल’ (वैश्विक) ख्याति प्राप्त की।
‘भारत उत्सव’ और विश्व भ्रमण
70 और 80 के दशक में भारत सरकार ने विदेशों में भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करने के लिए ‘भारत उत्सव‘ (Festivals of India) का आयोजन किया। देवदास बंजारे इन उत्सवों में भारत के लोक कला प्रतिनिधि (folk art representative) के रूप में शामिल हुए।
उन्होंने अपने 30 साल के करियर में 60 से अधिक देशों की यात्रा की । उनके पासपोर्ट पर लंदन, पेरिस, जर्मनी, फ्रांस, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों की मुहरें थीं।
पश्चिमी दर्शकों पर प्रभाव
पश्चिमी दर्शक, जो भारतीय नृत्य के नाम पर केवल भरतनाट्यम या कथक से परिचित थे, बंजारे के पंथी नृत्य को देखकर दंग रह गए। उनके पिरामिडों, बैक-फ्लिप और तीव्र गति ने उन्हें सम्मोहित कर दिया। बंजारे ने सिद्ध किया कि एक ‘लोक’ (Folk) कला भी उतनी ही अनुशासित और जटिल हो सकती है जितनी कोई ‘शास्त्रीय’ (Classical) कला। उन्होंने लंदन और पेरिस के मंचों पर छत्तीसगढ़ी अस्मिता का झंडा गाड़ा।
देवदास बंजारे का दार्शनिक विचार और सामाजिक प्रभाव
देवदास बंजारे केवल एक कलाकार नहीं थे; वे एक समाज सुधारक भी थे। उनके विचार उनके नृत्य जितने ही सशक्त थे।
दलित चेतना और आत्म-सम्मान
बंजारे ने अपने कला प्रदर्शनों और गीतों के माध्यम से दलित, शोषित और उत्पीड़ित समुदायों में आत्म-सम्मान (self-respect) की भावना जगाई । जब एक दलित नर्तक, जिसे समाज में हािए पर रखा गया हो, विश्व के सबसे बड़े मंचों पर खड़ा होकर तालियां बटोरता है, तो यह पूरे समुदाय के लिए गर्व का क्षण होता है। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने समुदाय के मानवाधिकारों और अस्तित्व के प्रति जागरूकता बढ़ाई।
शरीर: ईश्वर का मंदिर
बंजारे का शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण आध्यात्मिक था। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, “यह व्यक्तियों की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे अपने शरीर और स्वास्थ्य को बनाए रखें ताकि वे अच्छे कार्य करने और अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाने के लिए ईश्वर के उपहार का उचित उपयोग कर सकें।
यह विचार सतनामी दर्शन से मेल खाता है, जो नशाबंदी और सात्विक जीवन पर जोर देता है। बंजारे के लिए, एक अस्वस्थ या व्यसनी शरीर पवित्र नृत्य नहीं कर सकता। उनका जीवन युवाओं के लिए एक उदाहरण था कि कैसे अनुशासन और संयम से व्यक्ति महानता प्राप्त कर सकता है।
देवदास बंजारे का पुरस्कार और सम्मान: प्रतिभा का अभिनंदन
देवदास बंजारे की प्रतिभा को राज्य और केंद्र दोनों सरकारों ने समय रहते पहचाना और सम्मानित किया।
| वर्ष | पुरस्कार/सम्मान | प्रदाता | विवरण |
| 1972 | मुख्यमंत्री स्वर्ण पदक | मध्य प्रदेश सरकार | गिरौदपुरी मेले में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा |
| 1975 | राष्ट्रपति स्वर्ण पदक | भारत सरकार | पंथी नृत्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए |
| 1997 | विशेष सम्मान | गृह मंत्री श्री चरण दास महंत | सामाजिक और सांस्कृतिक सेवा के लिए |
| 2000-01 | दाऊ महासिंह चंद्राकर सम्मान | – | लोक कला के क्षेत्र में |
| – | गुरु घासीदास सम्मान | – | दलित समुदाय के उत्थान के लिए |
इन पुरस्कारों ने न केवल बंजारे की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा बढ़ाई, बल्कि पंथी नृत्य को भी राष्ट्रीय मान्यता दिलाई। 1975 का राष्ट्रपति पुरस्कार विशेष रूप से महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया।
देवदास बंजारे का महाप्रयाण और अमिट विरासत
एक दुखद अंत
नियति ने जिस तरह बंजारे को एक चोट के माध्यम से नृत्य की ओर मोड़ा था, उसी तरह एक और दुर्घटना ने उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी। 26 अगस्त 2005 को एक सड़क दुर्घटना में देवदास बंजारे का निधन हो गया । यह छत्तीसगढ़ के कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति थी। उनकी मृत्यु के साथ एक युग का अंत हो गया, लेकिन उनकी कला उनके साथ नहीं मरी।
देवदास बंजारे स्मृति पंथी नृत्य पुरस्कार
छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए ‘देवदास बंजारे स्मृति पंथी नृत्य पुरस्कार‘ (Devdas Banjare Smriti Panthi Dance Award) की स्थापना की है।
- उद्देश्य: यह पुरस्कार पंथी नृत्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कलाकारों और संस्थाओं को दिया जाता है।
- स्वरूप: इसमें 50,000 रुपये (राशि समय-समय पर परिवर्तित हो सकती है) की नकद राशि, स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र दिया जाता है ।
- महत्व: यह पुरस्कार राज्य स्थापना दिवस समारोह (राज्योत्सव) के अवसर पर दिया जाता है, जो इसे राज्य का एक प्रतिष्ठित अलंकरण बनाता है।
- पुरस्कार विजेता: दिनेश कुमार जांगड़े (2017), मिलाप दास बंजारे (2022) जैसे कलाकारों को यह पुरस्कार मिल चुका है, जो यह सिद्ध करता है कि बंजारे की परंपरा जीवित है ।
शिष्य परंपरा और शैक्षिक पाठ्यक्रम
देवदास बंजारे की विरासत उनके शिष्यों के माध्यम से जीवित है। उनके द्वारा प्रशिक्षित कई शिष्य आज भी देश-विदेश में पंथी का प्रदर्शन कर रहे हैं । मिलाप दास बंजारे जैसे नाम इस बात का प्रमाण हैं कि गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन हो रहा है।
इसके अतिरिक्त, छत्तीसगढ़ के स्कूली पाठ्यक्रम में उनके जीवन पर आधारित पाठ (‘Beats in Memoir’ कक्षा 8 अंग्रेजी पाठ्यपुस्तक) शामिल किए गए हैं । इससे आने वाली पीढ़ियां न केवल उनकी कला से बल्कि उनके संघर्ष और जीवन मूल्यों से भी परिचित हो रही हैं।
उपसंहार (Conclusion)
देवदास बंजारे का जीवन एक साधारण ग्रामीण परिवेश से उठकर वैश्विक मंच तक पहुँचने की एक अद्भुत गाथा है। उन्होंने एक स्थानीय धार्मिक अनुष्ठान को एक विश्वस्तरीय कला का दर्जा दिलाया। उन्होंने सिद्ध किया कि भाषा, क्षेत्र और जाति की सीमाएँ कला को नहीं बांध सकतीं।
उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने पंथी नृत्य को केवल ‘मनोरंजन’ नहीं रहने दिया, बल्कि उसे ‘अस्मिता‘ (Identity) और ‘प्रतिरोध‘ (Resistance) का प्रतीक बना दिया। जब आज भी छत्तीसगढ़ के किसी गाँव में मांदर की थाप पर ‘जैतखाम‘ के नीचे कोई युवा नर्तक हवा में छलांग लगाता है, तो उस छलांग में देवदास बंजारे की आत्मा जीवित हो उठती है। वे न केवल एक नर्तक थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक क्रांति के एक मूक नायक थे, जिनके पैरों की थिरकन आज भी इस राज्य की धड़कन बनी हुई है।
पारंपरिक बनाम बंजारे शैली पंथी नृत्य
| विशेषता | पारंपरिक पंथी | बंजारे शैली (आधुनिक पंथी) |
| उद्देश्य | मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठान और भक्ति। | भक्ति के साथ-साथ प्रदर्शन कला (Performing Art) और मनोरंजन। |
| गति | मध्यम और लयबद्ध। | धीमी शुरुआत से अत्यधिक तीव्र और विस्फोटक गति। |
| शारीरिक क्रियाएँ | गोलाकार नृत्य, झुकना, ताली बजाना। | मानव पिरामिड, बैक-फ्लिप, जटिल एक्रोबेटिक्स। |
| वेशभूषा | सामान्य धोती-कुर्ता, व्यक्तिगत विविधता संभव। | मानकीकृत (Standardized) सफेद धोती-बनियान, भारी घुंघरू, कंठी माला। |
| स्थान | गाँव का चौक, जैतखाम के पास। | आधुनिक मंच, थिएटर, स्टेडियम। |
देवदास बंजारे की कालरेखा (Timeline)
- 1937 (1 जनवरी): जन्म, ग्राम सांकरा, धमतरी (सर्वाधिक संभावित)।
- युवावस्था: कबड्डी खिलाड़ी के रूप में पहचान, चोट के बाद नृत्य में प्रवेश।
- 1950-60 का दशक: भिलाई इस्पात संयंत्र में नृत्य शिक्षक के रूप में नियुक्ति।
- 1972: मुख्यमंत्री स्वर्ण पदक प्राप्त (म.प्र. शासन)।
- 1975: राष्ट्रपति स्वर्ण पदक प्राप्त (भारत सरकार)।
- 1975: फिल्म ‘चरणदास चोर’ में प्रदर्शन और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति।
- 1970-1990: विश्व भ्रमण (60+ देश)।
- 2000-01: दाऊ महासिंह चंद्राकर सम्मान।
- 2005 (26 अगस्त): सड़क दुर्घटना में निधन।
- 2005 के बाद: छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनकी स्मृति में राज्य स्तरीय पुरस्कार की स्थापना।
बंजारे के नृत्य में प्रयुक्त वाद्ययंत्रों का विवरण
- मांदर (Mandar): यह मिट्टी या लकड़ी से बना एक बेलनाकार ढोल होता है। इसके दोनों सिरों पर चमड़ा मढ़ा होता है। यह पंथी नृत्य का मुख्य वाद्य है जो आधार ताल (Base Rhythm) प्रदान करता है। इसकी भारी और गूंजती आवाज नर्तकों के पैरों की गति को नियंत्रित करती है।
- झांझ (Jhanjh/Cymbal): यह पीतल या कांसे से बना होता है। दो गोलाकार प्लेटों को आपस में टकराने से एक तीखी ध्वनि उत्पन्न होती है। झांझ का काम ‘सम’ (Beat) को चिह्नित करना और नृत्य में उत्तेजना (Excitement) पैदा करना है। बंजारे शैली में, झांझ वादक भी नर्तकों के साथ कदमताल करते हुए नृत्य का हिस्सा बन जाते हैं।
References :
- http://www.cgculture.in/samman_front_list.aspx?id=6znLF6X86ersHsMkNUv5ig==
- https://www.etvbharat.com/hindi/chhattisgarh/state/raipur/story-of-devdash-banjare-jayanti-panthi-dancer-devdash-banjare/ct20221228223044983983706
- https://scert.cg.gov.in/pdf/textbook-2024-25/Reduced_Class-8-English%20Reader-2024-25.pdf
- https://as.wikipedia.org/wiki/%E0%A6%A6%E0%A7%87%E0%A7%B1%E0%A6%A6%E0%A6%BE%E0%A6%B8_%E0%A6%AC%E0%A6%A8%E0%A6%9C%E0%A6%BE%E0%A7%B0%E0%A7%87
देवदास बंजारे पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
देवदास बंजारे के जीवन, कला और विरासत पर आधारित 15 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs) यहाँ दिए गए हैं:
प्रश्न 1 : देवदास बंजारे किस नृत्य शैली के लिए विश्व विख्यात हैं?
उत्तर: वे छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पंथी नृत्य (Panthi Dance) के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसे उन्होंने वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
प्रश्न 2 : देवदास बंजारे का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म 1 जनवरी 1937 (कुछ स्रोतों में 1947) को छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सांकरा (Sankra) गाँव में हुआ था।
प्रश्न 3 : देवदास बंजारे नृत्य क्षेत्र में आने से पहले किस खेल के खिलाड़ी थे?
उत्तर: वे अपनी युवावस्था में एक प्रतिभाशाली कबड्डी (Kabaddi) खिलाड़ी थे।
प्रश्न 4 : उन्होंने कबड्डी छोड़कर पंथी नृत्य को क्यों चुना?
उत्तर: कबड्डी मैच के दौरान लगी एक गंभीर चोट के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने अपनी शारीरिक ऊर्जा को व्यक्त करने के लिए पंथी नृत्य को अपनाया।
प्रश्न 5 : देवदास बंजारे ने किस प्रसिद्ध फिल्म में अभिनय और नृत्य किया था?
उत्तर: उन्होंने श्याम बेनेगल की प्रसिद्ध फिल्म ‘चरणदास चोर’ (1975) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसमें उनके पंथी नृत्य को प्रमुखता से दिखाया गया था।
प्रश्न 6 : पंथी नृत्य में देवदास बंजारे का सबसे विशिष्ट योगदान क्या माना जाता है?
उत्तर: उन्होंने पारंपरिक नृत्य में मानव पिरामिड (Human Pyramids) और एक्रोबेटिक्स (Acrobatics) जैसी कठिन शारीरिक क्रियाओं का समावेश किया, जिसने इसे और अधिक आकर्षक बना दिया।
प्रश्न 7 : उन्हें ‘राष्ट्रपति स्वर्ण पदक’ (President’s Gold Medal) किस वर्ष प्राप्त हुआ?
उत्तर: लोक कला में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 1975 में राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।
प्रश्न 8 : देवदास बंजारे किस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते थे?
उत्तर: वे सतनामी समाज (Satnami Community) से थे और उनका नृत्य गुरु घासीदास जी के संदेशों को प्रसारित करने का माध्यम था।
प्रश्न 9: भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) में देवदास बंजारे किस पद पर कार्यरत थे?
उत्तर: वे भिलाई इस्पात संयंत्र के शिक्षा विभाग में नृत्य शिक्षक (Dance Teacher) के रूप में कार्यरत थे, जहाँ उन्होंने दो दशकों तक सेवा की।
प्रश्न 10 : देवदास बंजारे का निधन कब और कैसे हुआ?
उत्तर: 26 अगस्त 2005 को एक सड़क दुर्घटना में उनका दुखद निधन हो गया।
प्रश्न 11 : उनके माता-पिता का क्या नाम था?
उत्तर: उनके जैविक पिता बोधराम गेंद्रे थे, लेकिन उनका पालन-पोषण फूल सिंह बंजारे ने किया, जिनका उपनाम उन्होंने अपनाया। उनकी माता का नाम भगवती बाई था।
प्रश्न 12 : छत्तीसगढ़ सरकार उनकी स्मृति में कौन सा पुरस्कार प्रदान करती है?
उत्तर: राज्य सरकार द्वारा लोक कला और पंथी नृत्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए ‘देवदास बंजारे स्मृति पंथी नृत्य पुरस्कार’ दिया जाता है।
प्रश्न 13 : देवदास बंजारे ने लगभग कितने देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया?
उत्तर: उन्होंने अपने 30 वर्षों के करियर में 60 से अधिक देशों का दौरा किया और भारतीय लोक संस्कृति का प्रचार किया।
प्रश्न 14 : हबीब तनवीर के साथ उनका जुड़ाव किस संस्था के माध्यम से था?
उत्तर: वे हबीब तनवीर के ‘नया थियेटर’ (Naya Theatre) से जुड़े थे और उनके साथ कई नाटकों में देश-विदेश में प्रस्तुति दी।
प्रश्न 15 : पंथी नृत्य में प्रयुक्त होने वाली कुछ प्रमुख मुद्राओं के नाम क्या हैं जिन्हें बंजारे ने लोकप्रिय बनाया?
उत्तर: उनके नृत्य में ‘जय स्तंभ’ (Jai Stambh), ‘धरती प्रणाम’ (Dharti Pranam) और ‘फूल अर्पण’ (Phool Arpan) जैसी मुद्राएं प्रमुख थीं।










