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प्रस्तावना: छत्तीसगढ़ की वाचिक परंपरा और महाभारत का लोक-स्वर
शोध की पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य
भारत के हृदय स्थल में बसा छत्तीसगढ़ केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, अपितु यह एक ऐसा सांस्कृतिक पात्र है जिसमें सदियों से जनजातीय चेतना, लोक-आस्था और महाकाव्यों की गूँज सुरक्षित है। इस धरा की सबसे सशक्त और जीवंत पहचान ‘पंडवानी‘ है। पंडवानी, अर्थात् पांडवों की वाणी, महाभारत की कथा को जन-जन तक पहुँचाने का एक ऐसा माध्यम है जिसने अनपढ़ को भी ज्ञानी और ज्ञानी को भी भाव-विभोर किया है।
इस विधा को वैश्विक पटल पर स्थापित करने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को जाता है, तो वे निस्संदेह झाड़ूराम देवांगन हैं, जिन्हें लोक-जगत श्रद्धापूर्वक ‘पंडवानी का पितामह‘ कहता है। प्रस्तुत शोध प्रतिवेदन (रिपोर्ट) का उद्देश्य न केवल झाड़ूराम देवांगन की जीवनी को तिथिवार प्रस्तुत करना है, बल्कि उनके जीवन के माध्यम से छत्तीसगढ़ के सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक इतिहास का एक विस्तृत दस्तावेज तैयार करना है। यह रिपोर्ट 20वीं शताब्दी के मध्य भारत में लोक कलाओं के ‘शास्त्रीयकरण‘ (Sanskritization) की प्रक्रिया, गुरु-शिष्य परंपरा और वैश्वीकरण के दौर में लोक कलाकारों की स्थिति का भी गहन विश्लेषण करेगी।
पंडवानी: शब्द से प्रदर्शन तक
‘पंडवानी‘ शब्द की व्युत्पत्ति और इसका अर्थ अपने आप में गहन शोध का विषय है। ‘पांडव‘ और ‘वाणी‘ के योग से बना यह शब्द उस गायन शैली को इंगित करता है जिसमें महाभारत के नायकों, विशेषकर भीम, की शौर्य गाथाओं का वर्णन होता है । छत्तीसगढ़ में महाभारत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है; यह जीवन जीने की पद्धति है।
यहाँ के लोक-मानस में अर्जुन का गांडीव और भीम की गदा केवल युद्ध के उपकरण नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक हैं। झाड़ूराम देवांगन ने इसी लोक-चेतना को एक व्यवस्थित, संयमित और शास्त्र-सम्मत रूप प्रदान किया। जहाँ तीजन बाई जैसी कलाकारों ने इसे ‘कापालिक‘ शैली के माध्यम से अभिनय और देह-भाषा का रूप दिया, वहीं झाड़ूराम देवांगन ने ‘वेदमती‘ शैली के माध्यम से इसे भक्ति और ज्ञान का साधन बनाया ।
सांस्कृतिक पारिस्थितिकी और देवांगन समाज
झाड़ूराम देवांगन के व्यक्तित्व के निर्माण में उनके सामाजिक परिवेश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वे ‘देवांगन‘ जाति से आते थे, जिसका पारंपरिक व्यवसाय बुनाई (Weaving) है । कबीर की तरह, झाड़ूराम के लिए भी ताना-बाना केवल कपड़े का नहीं, बल्कि सुरों और शब्दों का भी था। यह समुदाय अपनी मेहनत, कलात्मकता और कबीर पंथ जैसे निर्गुण भक्ति आंदोलनों से गहरे जुड़ाव के लिए जाना जाता है। इस रिपोर्ट में हम देखेंगे कि कैसे एक बुनकर ने शब्दों के धागे से ऐसी चादर बुनी जिसने सात समंदर पार लंदन और पेरिस तक अपनी चमक बिखेरी।
झाड़ूराम देवांगन का प्रारंभिक जीवन : माटी से महाकाव्य तक
झाड़ूराम देवांगन का जन्म और वंश-परिचय
झाड़ूराम देवांगन का जन्म सन 1927 में अविभाजित मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के दुर्ग जिले के बासिन (Basin) गाँव में हुआ था । दुर्ग जिला छत्तीसगढ़ की संस्कृति का केंद्र बिंदु रहा है, और बासिन गाँव उस समय लोक कलाकारों की एक उर्वर भूमि थी। उनके पिता एक भजन गायक थे, जिससे संगीत के संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे। घर में रामायण, महाभारत और भजनों की गूँज ने बालक झाड़ूराम के अवचेतन मन में लय और ताल की समझ विकसित कर दी थी।
| विवरण | तथ्य |
| जन्म वर्ष | 1927 |
| जन्म स्थान | ग्राम बासिन, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ |
| पिता का व्यवसाय | भजन गायन एवं बुनाई |
| जाति/समुदाय | देवांगन (बुनकर समाज) |
| प्रारंभिक अभिरुचि | भजन और लोक कथा श्रवण |
झाड़ूराम देवांगन की बाल्यकाल की त्रासदी और आत्मनिर्भरता
नियति ने झाड़ूराम की परीक्षा बहुत कम उम्र में लेनी शुरू कर दी थी। मात्र 9 वर्ष की आयु में उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया । 1930 के दशक के ग्रामीण भारत में एक अनाथ बच्चे का जीवन संघर्षों से भरा होता था। सामाजिक सुरक्षा का अभाव और गरीबी ने उन्हें समय से पहले परिपक्व बना दिया। माता-पिता के निधन के बाद, उनका पालन-पोषण संभवतः उनके विस्तृत परिवार और समुदाय के लोगों द्वारा किया गया, लेकिन भावनात्मक रूप से वे एकाकी हो गए थे।
इसी अकेलेपन ने शायद उन्हें कथाओं और पात्रों की दुनिया की ओर मोड़ा, जहाँ वे अपने दुख को विस्मृत कर सकते थे। उन्होंने 12 वर्ष की आयु में ही पंडवानी गायन की शुरुआत कर दी थी, जो उनकी विलक्षण प्रतिभा का प्रमाण है।
एक साड़ी और महाभारत: जीवन का निर्णायक मोड़
झाड़ूराम देवांगन के जीवन की दिशा बदलने वाली घटना किसी दंतकथा से कम रोचक नहीं है। यह घटना लगभग 1940 के आसपास की है। किशोरवय झाड़ूराम, जो अपने पुश्तैनी पेशे के अनुसार बुनाई का काम करते थे, ने किसी यजमान के लिए एक साड़ी बुनी। जब वे साड़ी लेकर यजमान के पास गए, तो यजमान के पास मजदूरी चुकाने के लिए नकद पैसे नहीं थे। इसके बदले में, यजमान ने उन्हें एक पुरानी पुस्तक थमा दी। यह पुस्तक कोई साधारण किताब नहीं थी; यह सबल सिंह चौहान कृत महाभारत थी ।
यह घटना केवल एक वस्तु-विनिमय (Barter) नहीं थी; यह ज्ञान का हस्तांतरण था। उस समय तक पंडवानी मुख्य रूप से ‘स्मृति’ (Memory) और ‘श्रुति’ (Hearing) पर आधारित थी, जहाँ कलाकार एक-दूसरे से सुनकर कहानियाँ सीखते थे। लेकिन झाड़ूराम के हाथ में अब ‘ग्रंथ’ (Text) था।
करघे की लय और दोहा-चौपाई
सबल सिंह चौहान की महाभारत अवधी और ब्रज मिश्रित हिंदी में रचित है और इसे ‘दोहा-चौपाई‘ छंदों (Doha-Chaupai Metre) में लिखा गया है, ठीक वैसे ही जैसे तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की थी। झाड़ूराम ने इस ग्रंथ को अपना गुरु मान लिया। वे कपड़ा बुनते समय पुस्तक को अपने सामने खुला रखते और करघे की खट-खट की आवाज़ के साथ छंदों को रटते।
विश्लेषण: करघे की लयबद्ध ध्वनि और दोहा-चौपाई की मात्राओं (Matras) में एक स्वाभाविक सामंजस्य होता है। इस अभ्यास ने झाड़ूराम की गायकी में एक ऐसी पक्की लय (Rhythm) भर दी जो बाद में उनकी पहचान बनी। वेदमती शैली की सुदृढ़ता का रहस्य इसी रियाज़ में छिपा है।
झाड़ूराम देवांगन द्वारा वेदमती शैली का स्थापत्य: सिद्धांत और प्रयोग
वेदमती और कापालिक का द्वंद्व
पंडवानी की दुनिया दो प्रमुख शैलियों में विभाजित है: वेदमती और कापालिक। झाड़ूराम देवांगन को वेदमती शैली का प्रवर्तक और संरक्षक माना जाता है ।
इन दोनों शैलियों का तुलनात्मक विश्लेषण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:
| विशेषता | वेदमती शैली (झाड़ूराम देवांगन) | कापालिक शैली (तीजन बाई) |
| आसन (Posture) | कलाकार पूरे समय बैठकर गाता है (व्यासासन)। | कलाकार खड़ा होता है, घूमता है, नृत्य करता है। |
| आधार (Basis) | सबल सिंह चौहान कृत ‘ग्रंथ’ (Text) के प्रति निष्ठा। | ‘कापाल’ (मस्तिष्क/स्मृति) और आशुकाव्य (Improvisation)। |
| भाव (Mood) | शांत, भक्तिपूर्ण, व्याख्यात्मक। | वीर, अद्भुत, नाटकीय, रंजनात्मक। |
| तंबूरा का प्रयोग | केवल वाद्य यंत्र (गायन संगति) के रूप में। | गदा, धनुष, रथ आदि के प्रतीक के रूप में। |
| उद्देश्य | शिक्षा और धर्म का प्रचार। | मनोरंजन और कथा का अभिनय। |
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वेदमती की विशेषताएं और झाड़ूराम का योगदान
झाड़ूराम देवांगन की गायकी में एक शास्त्रीय गंभीरता थी। वे जमीन पर पालथी मारकर बैठते थे, हाथ में तंबूरा होता था, और वे किसी ऋषि की भांति कथा का वाचन करते थे। उनकी शैली को ‘वेदमती‘ इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें ‘वेद‘ (शास्त्र/ग्रंथ) की ‘मति‘ (बुद्धि/अनुसरण) थी।
- ग्रंथ की पवित्रता: झाड़ूराम का मानना था कि महाभारत एक पवित्र ग्रंथ है और इसमें अपनी मर्जी से काल्पनिक प्रसंग जोड़ना पाप है। उन्होंने पंडवानी को मनोरंजन से ऊपर उठाकर उसे ‘सत्संग‘ का रूप दिया।
- व्याख्यान (Arthav): वे पहले दोहा गाते थे, फिर गद्य में उसका अर्थ (Arthav) समझाते थे। उनकी भाषा ठेठ छत्तीसगढ़ी होते हुए भी इतनी परिष्कृत थी कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
- रागी की भूमिका: उनके साथ एक ‘रागी‘ होता था जो हुंकार भरता था। रागी के साथ उनका संवाद कथा को आगे बढ़ाता था और एकरसता को तोड़ता था।
इतवारी साहू के साथ ऐतिहासिक संघर्ष
झाड़ूराम देवांगन के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना प्रसिद्ध लोक कलाकार इतवारी साहू के साथ उनका वैचारिक संघर्ष था। जनश्रुतियों और शोधकर्ताओं (जैसे मुश्ताक खान और प्रीति बहादुर) के अनुसार, एक बार झाड़ूराम ने इतवारी साहू को पंडवानी गाते सुना। साहू मौखिक परंपरा के गायक थे और अपनी कथा में कई ऐसे प्रसंग सुना रहे थे जो मूल महाभारत या सबल सिंह चौहान के ग्रंथ में नहीं थे ।
झाड़ूराम इस ‘अशुद्धता‘ से क्रोधित हो उठे। उन्होंने इसे शास्त्र-विरुद्ध माना। इसके बाद दोनों के बीच एक सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा (Challenge) हुई। झाड़ूराम, जो ग्रंथ के ज्ञान से लैस थे, ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रचलित मौखिक कहानियाँ ‘कापालिक‘ (मनगढ़ंत/काल्पनिक) हैं। इस घटना ने छत्तीसगढ़ में पंडवानी का ध्रुवीकरण कर दिया। झाड़ूराम की जीत केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं थी, बल्कि यह लोक परंपरा पर ‘लिखित शब्द‘ (Written Word) की सत्ता की स्थापना थी। इसने वेदमती शैली को ‘शुद्ध’ और ‘श्रेष्ठ‘ का दर्जा दिलाया।
झाड़ूराम देवांगन की कला यात्रा: स्थानीय चौपाल से आकाशवाणी तक
आकाशवाणी भोपाल का ऐतिहासिक प्रसारण (1964)
आधुनिक संचार माध्यमों ने झाड़ूराम की कला को गाँव की सीमाओं से बाहर निकाला। सन 1964 में उन्हें आकाशवाणी (All India Radio) भोपाल से पंडवानी गायन के लिए आमंत्रित किया गया । यह वह दौर था जब रेडियो जनसंचार का सबसे सशक्त माध्यम था। जब ईथर की तरंगों पर झाड़ूराम की खनकती आवाज़ में “बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय” गूंजा, तो पूरा मध्य भारत ठिठक गया।
इस प्रसारण ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए:
- मानकीकरण (Standardization): उनकी शैली पंडवानी का ‘मानक‘ बन गई।
- प्रतिष्ठा: रेडियो पर आने का अर्थ था कलाकार का ‘बड़ा‘ हो जाना। इसने उन्हें सरकारी संरक्षण के दायरे में ला खड़ा किया।
हबीब तनवीर और रंगमंच का प्रभाव
1970 और 80 के दशक में, प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को अपने नाटकों (जैसे ‘चरणदास चोर‘) में शामिल कर रहे थे। यद्यपि झाड़ूराम सीधे तौर पर हबीब तनवीर की मंडली के अभिनेता नहीं थे, लेकिन तनवीर द्वारा बनाए गए वातावरण ने छत्तीसगढ़ी लोक कला के प्रति शहरी बुद्धिजीवियों का नज़रिया बदल दिया था। झाड़ूराम की कथा-वाचन शैली का प्रभाव हबीब तनवीर के नाटकों की मुक्त-शैली (Free-style narration) पर भी देखा जा सकता है।
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झाड़ूराम देवांगन की अंतर्राष्ट्रीय यात्राएं : वैश्विक पटल पर छत्तीसगढ़ का नाद
भारत महोत्सव (Festival of India) – 1982
झाड़ूराम देवांगन के करियर का स्वर्ण युग 1980 का दशक था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सांस्कृतिक सलाहकार पुपुल जयकर के नेतृत्व में ‘भारत महोत्सव‘ (Festivals of India) का आयोजन दुनिया भर में किया जा रहा था। इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति की विविधता को विश्व पटल पर रखना था।
सन 1982 में झाड़ूराम देवांगन को लंदन (ब्रिटेन) भेजा गया । कल्पना कीजिए, एक बुनकर जो छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव बासिन से निकला हो, वह लंदन के प्रतिष्ठित मंचों पर बैठकर ठेठ छत्तीसगढ़ी में महाभारत सुना रहा था। भाषा की बाधा के बावजूद, उनके स्वर का आरोह-अवरोह और तंबूरे की झनकार ने विदेशी श्रोताओं को सम्मोहित कर लिया।
यूरोप और विश्व भ्रमण
लंदन की सफलता के बाद, उनकी यात्राओं का सिलसिला चल पड़ा। 1975 से 1985 के मध्य उन्होंने फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा की । इन यात्राओं ने सिद्ध कर दिया कि वेदमती शैली, जिसमें नृत्य और नाटक का अभाव था, केवल अपनी सांगीतिक और आध्यात्मिक शक्ति के बल पर भी वैश्विक दर्शकों को बांध सकती है। वे सही मायनों में छत्तीसगढ़ के प्रथम ‘सांस्कृतिक राजदूत‘ (Cultural Ambassador) बने।
झाड़ूराम देवांगन का सम्मान और उपलब्धियां
झाड़ूराम देवांगन को उनके जीवनकाल में ही वे सभी सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुए जो किसी कलाकार का सपना होते हैं। ये पुरस्कार केवल उनके व्यक्तिगत कौशल का सम्मान नहीं थे, बल्कि उस पूरी परंपरा का सम्मान थे जिसे उन्होंने पुनर्जीवित किया था।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1988)

सन 1988 में, भारत सरकार की संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया । यह प्रदर्शन कलाओं के क्षेत्र में भारत का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान है। पुरस्कार स्वरूप उन्हें ताम्रपत्र, अंगवस्त्र और नकद राशि प्रदान की गई। यह पुरस्कार पंडवानी के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि इसने इस लोक विधा को शास्त्रीय संगीत और नृत्य के बराबर लाकर खड़ा कर दिया।
अवार्ड की जानकारी का PDF : https://www.sangeetnatak.gov.in/public/uploads/awardees/docs/1749464519_Jhaduram.pdf
तुलसी सम्मान (1990-91)
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित तुलसी सम्मान आदिवासी, लोक और पारंपरिक कलाओं के लिए दिया जाने वाला एक अत्यंत प्रतिष्ठित पुरस्कार है। झाड़ूराम देवांगन को वर्ष 1990-91 के लिए इस सम्मान से विभूषित किया गया । गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर दिया जाने वाला यह पुरस्कार झाड़ूराम के लिए सर्वथा उपयुक्त था, क्योंकि जैसे तुलसीदास ने रामकथा को जनभाषा में सुलभ कराया, वैसे ही झाड़ूराम ने महाभारत को छत्तीसगढ़ी जनमानस में रोपित किया।
अन्य महत्वपूर्ण सम्मान
- शिखर सम्मान: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा साहित्य और कला के क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए दिया जाने वाला ‘शिखर सम्मान‘ भी उन्हें प्राप्त हुआ ।
- दाऊ दुलार सिंह मंदराजी सम्मान: छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद (या उससे पूर्व की सांस्कृतिक पहचान के अंतर्गत), वे इस सम्मान के प्रथम प्राप्तकर्ता (First Recipient) बने । दाऊ मंदराजी छत्तीसगढ़ी नाचा के भीष्म पितामह माने जाते हैं, अतः उनके नाम का पहला पुरस्कार झाड़ूराम को मिलना यह दर्शाता है कि राज्य की सांस्कृतिक पदानुक्रम में उनका स्थान कितना ऊँचा था।
झाड़ूराम देवांगन की विरासत : गुरु-शिष्य परंपरा
पूनाराम निषाद: उत्तराधिकारी
झाड़ूराम देवांगन की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी शिष्य परंपरा है। उन्होंने ‘वेदमती‘ शैली को मरने नहीं दिया। उनके सबसे प्रमुख शिष्य पूनाराम निषाद थे । पूनाराम भी एक भजन गायक के पुत्र थे और मात्र 10 वर्ष की आयु में झाड़ूराम की शरण में आए थे। झाड़ूराम ने उन्हें कठोर अनुशासन में वेदमती शैली सिखाई। आगे चलकर पूनाराम निषाद स्वयं ‘पंडवानी गुरु‘ कहलाए और उन्हें भी पद्मश्री तथा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। गुरु और शिष्य, दोनों ने मिलकर वेदमती शैली को एक ‘घराना‘ (School) का रूप दे दिया।
अन्य शिष्य और प्रभाव
उनके अन्य प्रमुख शिष्यों और उनकी शैली से प्रभावित कलाकारों में शामिल हैं:
- चेतन देवांगन: जो आज भी सक्रिय हैं और देश-विदेश में प्रस्तुतियाँ दे रहे हैं ।
- ऋतु वर्मा: यद्यपि वे एक महिला कलाकार हैं, लेकिन उनकी शैली में झाड़ूराम की वेदमती परंपरा की स्पष्ट छाप दिखाई देती है 1।
यह उल्लेखनीय है कि तीजन बाई, जो कापालिक शैली की महारानी हैं, भी झाड़ूराम देवांगन को अपना प्रेरणा स्रोत और ‘पितामह‘ मानती हैं। यद्यपि उनकी शैलियाँ भिन्न थीं, लेकिन तीजन बाई ने भी सबल सिंह चौहान के उसी ग्रंथ को आधार बनाया जिसे झाड़ूराम ने स्थापित किया था।
पारिवारिक विरासत: कुंज बिहारी देवांगन
झाड़ूराम की जैविक विरासत उनके पुत्र कुंज बिहारी देवांगन ने संभाली । कुंज बिहारी अपने पिता के साथ संगत करते थे और उन्होंने पंडवानी में बैंजो (बुलबुल तरंग) वाद्य यंत्र का समावेश किया। यह एक महत्वपूर्ण नवाचार था। तंबूरा जहाँ प्राचीनता का प्रतीक था, वहीं बैंजो ने पंडवानी को आधुनिक सुरीलापन दिया। पिता-पुत्र की यह जोड़ी मंच पर एक जादुई वातावरण निर्मित करती थी।
वेदमती शैली का तकनीकी विश्लेषण
झाड़ूराम की कला को समझने के लिए उनकी तकनीक की गहराई में जाना आवश्यक है।
| तत्व | विवरण |
| ग्रंथ आधार | सबल सिंह चौहान कृत महाभारत (17वीं शताब्दी)। |
| छंद (Meter) | दोहा (Couplet) और चौपाई (Quatrain)। |
| भाषा | छत्तीसगढ़ी मिश्रित अवधी/हिंदी। |
| वाद्य यंत्र | तंबूरा (मुख्य), ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा। |
| गायन संरचना | 1. मंगलाचरण (वंदना) 2. दोहा गायन (प्रसंग का सूत्र) 3. अर्थव (गद्य में व्याख्या) 4. चौपाई (कथा का विस्तार) |
उनके गायन में ‘विराम‘ का बहुत महत्व था। वे कथा कहते-कहते रुकते, रागी की हुंकार का इंतज़ार करते, और फिर एक नई ऊर्जा के साथ अगली पंक्ति उठाते। उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी कशिश थी—एक प्रकार का ‘नैजल ट्वैंग‘ (Nasal twang) जो छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की विशेषता है, लेकिन उसमें शास्त्रीय संगीत की पक्की सुर-साधना भी थी।
झाड़ूराम देवांगन के सामाजिक-सांस्कृतिक विश्लेषण: संस्कृतिकरण (Sanskritization)
समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास द्वारा प्रतिपादित ‘संस्कृतिकरण‘ की अवधारणा झाड़ूराम देवांगन के जीवन पर सटीक बैठती है।
- निम्न जाति का उत्थान: देवांगन समाज, जो पारंपरिक वर्ण व्यवस्था में उच्च स्थान पर नहीं था, ने झाड़ूराम के माध्यम से ‘शास्त्र‘ (Text) पर अधिकार जमाया।
- कापालिक बनाम वेदमती: मौखिक परंपरा (कापालिक) को अक्सर ‘अशिक्षित‘ या ‘गंवारू‘ माना जाता था। झाड़ूराम ने ‘ग्रंथ‘ को अपनाकर अपनी कला को ‘विद्वतापूर्ण’ और ‘पवित्र’ बना दिया।
- शुद्धतावाद: उन्होंने पंडवानी से अश्लील और हल्के प्रसंगों को हटाकर उसे पारिवारिक और धार्मिक बना दिया। इसी कारण उन्हें मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग का भी संरक्षण प्राप्त हुआ।
उपसंहार: एक युग का अवसान और शाश्वत कीर्ति
पंडवानी के इस महान साधक का देहावसान 14 जून 2002 (अनुमानित) के आसपास हुआ, लेकिन वे अपनी कला के माध्यम से अमर हो गए । उनकी मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी, बल्कि वेदमती शैली के एक स्वर्ण युग का अंत था।
आज जब हम छत्तीसगढ़ की बात करते हैं, तो तीजन बाई का चेहरा सामने आता है, लेकिन तीजन बाई जिस महल की शीर्ष मीनार हैं, उसकी नींव की ईंट झाड़ूराम देवांगन हैं। उन्होंने एक क्षेत्रीय बोली की कथा को विश्व साहित्य के समकक्ष खड़ा कर दिया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि एक बुनकर केवल कपड़ा नहीं बुनता, वह समाज के संस्कारों को भी बुनता है।
झाड़ूराम देवांगन सही मायनों में ‘पंडवानी के पितामह‘ थे—भीष्म की तरह अटल, ज्ञानी और अपनी परंपरा के प्रति समर्पित। जब तक छत्तीसगढ़ की माटी में महाभारत की गूँज रहेगी, तंबूरे की हर झनकार में झाड़ूराम देवांगन जीवित रहेंगे।
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झाड़ूराम देवांगन: एक दृष्टि में (महत्वपूर्ण तथ्य)
| श्रेणी | विवरण |
| उपाधि | पंडवानी के पितामह (Grandfather of Pandwani) |
| शैली | वेदमती (सबल सिंह चौहान कृत महाभारत पर आधारित) |
| प्रमुख शिष्य | पूनाराम निषाद, चेतन देवांगन, रितु वर्मा |
| पुत्र | कुंज बिहारी देवांगन (बैंजो वादक) |
| अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन | लंदन (1982), फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड |
| प्रमुख पुरस्कार | संगीत नाटक अकादमी (1988), तुलसी सम्मान (1990-91), शिखर सम्मान |
| योगदान | पंडवानी का मानकीकरण और शास्त्रीयकरण |
“ये महाभारत के लड़ाई आय, धर्म के लड़ाई आय…” — झाड़ूराम देवांगन के ये शब्द आज भी छत्तीसगढ़ की हवाओं में गूंजते हैं, जो हमें याद दिलाते हैं कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि धर्म और जीवन का सार है।
References :
- https://www.sangeetnatak.gov.in/public/uploads/awardees/docs/1749464519_Jhaduram.pdf
- https://www.naidunia.com/chhattisgarh/bhilai-postal-deparment-will-launch-special-envelope-on-jhaduram-dewangan-117609
- https://www.dewanganjan.com/post/%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A4%AC-%E0%A4%9D%E0%A4%BE%E0%A4%A1-%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B9-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A5%E0%A4%BF-14-%E0%A4%9C%E0%A5%82%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96
- https://shreekanchanpath.com/%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%9D%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%A6%E0%A5%87/
- https://cgbigul.com/chhattisgarh-ke-lok-kalakar-ka-jivan-parichay/
- https://en.wikipedia.org/wiki/Tulsi_Samman
झाड़ूराम देवांगन पर महत्वपूर्ण FAQs (Hindi FAQs)
1. झाड़ूराम देवांगन कौन थे?
वे छत्तीसगढ़ के महान लोककला साधक, वेदमती शैली के प्रवर्तक और “पंडवानी के पितामह” थे जिन्होंने महाभारत की कथा को लोकभाषा में प्रतिष्ठित किया।
2. झाड़ूराम देवांगन का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म वर्ष 1927 में ग्राम बासिन, जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़) में हुआ था।
3. झाड़ूराम देवांगन किस समाज से संबंधित थे?
वे देवांगन (बुनकर) समुदाय से आते थे, जो छत्तीसगढ़ का एक परंपरागत कलात्मक समाज है।
4. उन्हें पंडवानी में रुचि कैसे हुई?
बचपन में भजन–कथाओं के संपर्क और बाद में मजदूरी के बदले मिली सबल सिंह चौहान कृत महाभारत ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे पंडवानी गायन की ओर अग्रसर हुए।
5. वेदमती शैली क्या है?
यह पंडवानी की ग्रंथ-निष्ठ, शांत, बैठकर प्रस्तुत की जाने वाली शैली है जिसमें कलाकार दोहा–अर्थ–चौपाई के माध्यम से महाभारत का वाचन करता है। इसके संस्थापक झाड़ूराम देवांगन माने जाते हैं।
6. वेदमती और कापालिक शैली में क्या अंतर है?
वेदमती शैली में कलाकार बैठकर कहानी सुनाता है और ग्रंथ का अनुसरण करता है; कापालिक शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय, देह-भाषा और नाटकीयता का प्रयोग करता है।
7. झाड़ूराम देवांगन का पहला बड़ा मंच कौन सा था?
सन 1964 में आकाशवाणी भोपाल से उनका पंडवानी प्रसारण हुआ जिसने उन्हें प्रदेश और देशभर में पहचान दिलाई।
8. उन्होंने पंडवानी में कौन-सी महत्वपूर्ण सुधार किये?
उन्होंने पंडवानी का मानकीकरण, “शुद्ध” वेदमती शैली की स्थापना, ग्रंथ-आधारित प्रस्तुति, अनुशासन और शिक्षण–व्याख्या पर जोर दिया।
9. इतवारी साहू से उनका विवाद क्यों हुआ?
क्योंकि साहू मौखिक परंपरा के अनुसार कथाओं में परिवर्तित प्रसंग जोड़ते थे। झाड़ूराम इसे “अशुद्धता” मानते थे। दोनों के बीच हुई सार्वजनिक प्रतियोगिता ने वेदमती को पंडवानी का प्रमुख रूप बना दिया।
10. किन देशों में झाड़ूराम देवांगन ने प्रस्तुति दी?
उन्होंने लंदन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड सहित कई यूरोपीय देशों में पंडवानी का प्रदर्शन किया।
11. उन्हें कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1988)
तुलसी सम्मान (1990–91)
शिखर सम्मान
दाऊ मंदराजी सम्मान (प्रथम प्राप्तकर्ता)
12. उनके प्रमुख शिष्य कौन थे?
उनके मुख्य शिष्य पूनाराम निषाद, चेतन देवांगन और ऋतु वर्मा रहे। पूनाराम निषाद बाद में स्वयं पद्मश्री सम्मानित कलाकार बने।
13. पंडवानी में उनके पुत्र का योगदान क्या है?
उनके पुत्र कुंज बिहारी देवांगन ने पंडवानी में बैंजो (बुलबुल तरंग) का उपयोग शुरू किया, जिससे संगीत में आधुनिकता आई।
14. झाड़ूराम देवांगन की प्रस्तुति की विशेषताएँ क्या थीं?
शांत, गंभीर और आध्यात्मिक स्वर
दोहा–चौपाई की पाठन शैली
तंबूरे का प्रभुत्व
अर्थव (व्याख्या) की स्पष्टता
शास्त्रीय अनुशासन और धैर्य
15. झाड़ूराम देवांगन का निधन कब हुआ और उनकी विरासत क्या है?
उनका निधन लगभग 14 जून 2002 के आसपास हुआ। उनकी वेदमती शैली, शिष्य परंपरा और महाभारत का लोक-स्वर आज भी पंडवानी की आत्मा बनी हुई है।










