
यह विस्तृत शोध प्रतिवेदन छत्तीसगढ़ की लोक कला के पर्याय और राज्य की सांस्कृतिक पहचान की ध्वजवाहक, पद्मश्री ममता चंद्राकर (मोक्षदा चंद्राकर) के जीवन, कलात्मक यात्रा और प्रशासनिक कार्यकाल का एक गहन दस्तावेजीकरण है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य न केवल एक जीवनी प्रस्तुत करना है, बल्कि ममता चंद्राकर के माध्यम से पिछले पांच दशकों में छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पुनर्जागरण, लोक संगीत के व्यावसायीकरण और कला-राजनीति के अंतर्संबंधों का विस्तृत विश्लेषण करना है।
यह दस्तावेज़ 1970 के दशक के ‘सोनहा बिहान‘ आंदोलन से लेकर 2024 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के कुलपति पद से उनके विवादास्पद निष्कासन तक की यात्रा को कवर करता है। इसमें उनके द्वारा गाए गए कालजयी गीतों का समाजशास्त्रीय विश्लेषण, उनके परिवार की सांगीतिक विरासत और डिजिटल युग में लोक संगीत के संरक्षण में उनकी भूमिका का भी समावेश है।
Table of Contents
प्रस्तावना – माटी की गंध और सांस्कृतिक अस्मिता का स्वर
संक्षिप्त परिचय
भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक विविधता में छत्तीसगढ़ का स्थान अद्वितीय है। इसे ‘धान का कटोरा‘ कहा जाता है, लेकिन सांस्कृतिक रूप से यह लोक गीतों, गाथाओं और नृत्यों का एक समृद्ध महासागर है। इस महासागर में यदि कोई एक स्वर पिछले 50 वर्षों से निरंतर गूंज रहा है, तो वह स्वर ममता चंद्राकर का है।
उन्हें केवल एक गायिका के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा; वे छत्तीसगढ़ी अस्मिता (Identity) का एक जीवंत प्रतीक हैं। जब राज्य का गठन नहीं हुआ था और यह मध्य प्रदेश का एक हिस्सा मात्र था, तब भी ममता चंद्राकर के गीतों ने इस क्षेत्र को एक अलग भाषाई और भावनात्मक पहचान दी थी।
‘छत्तीसगढ़ की स्वर कोकिला’ की उपाधि का औचित्य
उन्हें ‘छत्तीसगढ़ की स्वर कोकिला‘ (Nightingale of Chhattisgarh) कहा जाता है । यह उपाधि उनकी आवाज की उस विशिष्ट बनावट (Texture) को रेखांकित करती है जो कृत्रिमता से परे है। उनकी गायकी में मिट्टी की सौंधी महक, खेतों की हरियाली और ग्रामीण जीवन की सरलता का अद्भुत मिश्रण है। चाहे वह विरह की वेदना हो, विवाह का उल्लास हो, या राज्य वंदना का गौरव, ममता चंद्राकर की आवाज हर भाव को उसकी पूर्णता में व्यक्त करती है। यह रिपोर्ट विश्लेषण करती है कि कैसे उनकी आवाज ने तीन पीढ़ियों—रेडियो युग, कैसेट युग और डिजिटल युग को एक सूत्र में पिरोया है।
रिपोर्ट का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र
इस रिपोर्ट का प्राथमिक उद्देश्य ममता चंद्राकर के जीवन के उन पहलुओं को उजागर करना है जो सामान्यतः मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आ पाते। इसमें शामिल हैं:
- उनके पिता दाऊ महासिंह चंद्राकर द्वारा शुरू किए गए सांस्कृतिक आंदोलन का प्रभाव।
- लोक संगीत में उनके तकनीकी और कलात्मक योगदान।
- इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (IKSV) के कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल और 2024 में उनकी बर्खास्तगी के पीछे के प्रशासनिक और राजनीतिक कारण ।
- उनके प्रमुख गीतों का सांस्कृतिक विखंडन (Deconstruction)।
ममता चंद्राकर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पारिवारिक विरासत (1950-1974)
जन्म और प्रारंभिक परिवेश
ममता चंद्राकर का जन्म 3 दिसंबर 1958 को अविभाजित मध्य प्रदेश के दुर्ग जिले में हुआ था । उनका मूल नाम ‘मोक्षदा चंद्राकर‘ है। 1950 का दशक भारत में सांस्कृतिक संक्रमण का दौर था। रेडियो पर हिंदी सिनेमा का संगीत हावी हो रहा था और क्षेत्रीय लोक कलाएं हासिये पर जा रही थीं। ऐसे समय में, दुर्ग जिला छत्तीसगढ़ी संस्कृति का एक गढ़ बनकर उभरा।
ममता चंद्राकर का संक्षिप्त जीवन परिचय
| विवरण | जानकारी |
| मूल नाम | मोक्षदा चंद्राकर |
| प्रचलित नाम | ममता चंद्राकर |
| जन्म तिथि | 3 दिसंबर 1958 |
| जन्म स्थान | दुर्ग, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन म.प्र.) |
| पिता | दाऊ महासिंह चंद्राकर |
| माता | गयाबाई चंद्राकर |
| जीवनसाथी | प्रेम चंद्राकर (विवाह: 1986) |
| संतान | पूर्वी चंद्राकर |
| शिक्षा | एम.ए. (गायन), इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय |
| पेशा | लोक गायिका, पूर्व सहायक निदेशक (AIR), पूर्व कुलपति (IKSV) |
दाऊ महासिंह चंद्राकर: लोक कला के भीष्म पितामह
ममता चंद्राकर को समझने के लिए उनके पिता, दाऊ महासिंह चंद्राकर को समझना अनिवार्य है। दाऊ महासिंह केवल एक पिता नहीं, बल्कि ममता के पहले गुरु और छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के पुनरुद्धारक थे। वे उस दौर के विजनरी थे जिन्होंने महसूस किया कि यदि लोक कला को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट जाएंगी ।
‘सोनहा बिहान’ आंदोलन (1974)
1974 का वर्ष छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास में एक मील का पत्थर है। दाऊ महासिंह ने “सोनहा बिहान” (जिसका अर्थ है ‘सुनहरी सुबह’) नामक संस्था की स्थापना की। यह केवल एक नाच-गाना मंडली नहीं थी, बल्कि एक विचार था।
- उद्देश्य: लोक संगीत की आत्मा को जीवित रखना और उसे मंच पर सम्मानजनक स्थान दिलाना।
- ऐतिहासिक प्रदर्शन: मार्च 1974 में, सोनहा बिहान का प्रदर्शन 40,000 से 50,000 लोगों की विशाल भीड़ के सामने हुआ । उस समय, बिना सोशल मीडिया और इंटरनेट के, इतनी भीड़ जुटाना इस बात का प्रमाण था कि लोग अपनी संस्कृति के लिए कितने प्यासे थे।
- ममता का प्रवेश: मात्र 10 वर्ष की आयु में ममता ने इसी मंच से अपनी यात्रा शुरू की। इतनी विशाल जनसभा के सामने प्रदर्शन करने से उनके भीतर का मंच भय (Stage Fear) हमेशा के लिए समाप्त हो गया और उन्होंने संवाद स्थापित करने की कला सीखी।
प्रशिक्षण और अनुशासन
दाऊ महासिंह का प्रशिक्षण गुरुकुल पद्धति जैसा कठोर था। वे सुरों की शुद्धता के साथ-साथ शब्दों के सही उच्चारण (Diction) पर बहुत जोर देते थे। छत्तीसगढ़ी बोली में ‘ह’, ‘ल’ और ‘र’ के उच्चारण की अपनी विशिष्टता है, जिसे ममता ने अपने पिता से आत्मसात किया। माता गयाबाई चंद्राकर ने उन्हें भावनात्मक संबल प्रदान किया, जिससे उनकी गायकी में करुणा (Pathos) का समावेश हुआ ।
ममता चंद्राकर की सांगीतिक शिक्षा और लता मंगेशकर का प्रभाव
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (IKSV): एक छात्रा के रूप में
लोक संगीत की अनौपचारिक शिक्षा के बाद, ममता ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा लेने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने खैरागढ़ स्थित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। यह एशिया का पहला संगीत विश्वविद्यालय है। यहाँ से उन्होंने गायन में स्नातकोत्तर (M.A. in Vocal Music) की डिग्री प्राप्त की ।
1980 की ऐतिहासिक घटना
ममता चंद्राकर के जीवन का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग 2 फरवरी 1980 को घटित हुआ। उस दिन भारत रत्न लता मंगेशकर को IKSV द्वारा डी.लिट (D.Litt) की मानद उपाधि से सम्मानित किया जा रहा था। उस समय ममता वहां एक छात्रा थीं।
- भूमिका: विश्वविद्यालय की परंपरा के अनुसार, ममता उन छात्रों के समूह में शामिल थीं जिन्हें अतिथियों को भोजन परोसने का दायित्व सौंपा गया था ।
- प्रेरणा: लता मंगेशकर को इतने निकट से देखना और उन्हें सुनना ममता के लिए एक दैवीय अनुभव था। लता जी की सादगी और साधना ने ममता को यह सिखाया कि महानता विनम्रता में बसती है। यह नियति का एक सुंदर चक्र है कि जिस विश्वविद्यालय में उन्होंने अतिथियों की सेवा की, दशकों बाद वे उसी विश्वविद्यालय की कुलपति बनीं।
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ममता चंद्राकर की पेशेवर यात्रा और ‘चिन्हारी’ (1977-2000)
आकाशवाणी रायपुर का दौर (1977)
1977 में, ममता चंद्राकर ने आकाशवाणी (All India Radio) रायपुर के साथ एक पेशेवर लोक गायिका के रूप में अपना करियर शुरू किया ।
- माध्यम की शक्ति: 70 और 80 के दशक में रेडियो ही मनोरंजन और सूचना का एकमात्र सशक्त माध्यम था। ‘चौपाल‘ और ‘बस्तर की पाती‘ जैसे कार्यक्रमों में ममता की आवाज गूंजने लगी।
- सहायक निदेशक का पद: अपनी प्रतिभा और समर्पण के कारण, वे बाद में आकाशवाणी रायपुर में सहायक निदेशक (Assistant Director) के पद तक पहुंचीं । इस प्रशासनिक पद पर रहते हुए उन्होंने नए कलाकारों को खोजने (Talent Scouting) और लुप्त होती लोक विधाओं को रिकॉर्ड करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
प्रेम चंद्राकर और ‘चिन्हारी’ का गठन
1986 में ममता का विवाह ‘प्रेम चंद्राकर’ से हुआ। प्रेम चंद्राकर स्वयं एक प्रतिष्ठित निर्माता और निर्देशक हैं, जो छत्तीसगढ़ी सिनेमा (छॉलीवुड) के स्तंभ माने जाते हैं ।
- सांगीतिक साझेदारी: यह विवाह दो कलाकारों का मिलन था। प्रेम चंद्राकर की तकनीकी समझ और ममता की गायकी ने मिलकर जादू कर दिया।
- ‘चिन्हारी’ (Chinhari): विवाह के बाद, इस दम्पति ने “चिन्हारी” (जिसका अर्थ है ‘निशानी’ या ‘स्मृति चिन्ह’) नामक लोक कला मंच की स्थापना की। चिन्हारी ने दाऊ महासिंह की ‘सोनहा बिहान‘ की विरासत को आधुनिक तकनीकों के साथ आगे बढ़ाया।
- नवाचार: चिन्हारी के माध्यम से उन्होंने लोक नृत्यों की कोरियोग्राफी, प्रकाश व्यवस्था (Lighting) और ध्वनि (Sound) में आधुनिक प्रयोग किए, जिससे लोक कला शहरी दर्शकों के लिए भी आकर्षक बन गई।
कैसेट क्रांति (Cassette Revolution)
1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में टी-सीरीज (T-Series) और स्थानीय कंपनियों जैसे सुंदरानी वीडियो वर्ल्ड (Sundrani Video World) और एवीएम (AVM) के आगमन से कैसेट क्रांति हुई।
- ममता चंद्राकर के एल्बमों—जैसे “मया दे दे मयारू“, “तोर मन कैसे लागे“, “बिहाव गीत” ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
- इस दौर ने ममता को घर-घर में एक चेहरा (Face) दे दिया, क्योंकि अब लोग केवल उनकी आवाज नहीं सुन रहे थे, बल्कि वीडियो एल्बमों के माध्यम से उन्हें देख भी रहे थे।
ममता चंद्राकर की कला और गायन शैली का विश्लेषण
ममता चंद्राकर की सफलता का रहस्य उनकी गायकी की विविधता और गहराई में छिपा है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की लगभग हर विधा को स्पर्श किया है।
प्रमुख सांगीतिक विधाएं (Genres)
| विधा | विवरण | ममता चंद्राकर का योगदान |
| ददरिया (Dadaria) | इसे छत्तीसगढ़ का ‘प्रेम गीत’ कहा जाता है। इसमें प्रश्न-उत्तर (सवाल-जवाब) की शैली होती है। | उन्होंने दादरिया को शास्त्रीय गरिमा दी। गीत: “तोर मन कैसे लागे राजा“ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। |
| कर्मा (Karma) | आदिवासियों का प्रमुख नृत्य गीत, जो कर्म देवता को समर्पित है। इसमें मांदर की थाप प्रमुख होती है। | उनके कर्मा गीतों में अद्भुत ऊर्जा होती है। गीत: “कर्मा नाचे ला जाबो रे“ । |
| सुआ (Suwa) | दीपावली के समय महिलाओं द्वारा तोते (सुआ) के माध्यम से संदेश भेजने वाला गीत। | उन्होंने सुआ गीतों के माध्यम से नारी वेदना को स्वर दिया। गीत: “बिधिना के कैसे रचना“ । |
| बिहाव गीत (Bihav) | विवाह के विभिन्न रस्मों (हल्दी, मड़वा, भांवर, विदाई) के गीत। | उनके बिहाव गीत आज भी शादियों में अनिवार्य हैं। विशेषकर विदाई गीत “माटी ला छोड़ झन जाना“। |
| गौरा-गौरी (Gaura-Gauri) | शिव-पार्वती विवाह उत्सव के गीत। | उन्होंने इस धार्मिक परंपरा को लोकप्रिय बनाया। एल्बम: “जोहर जोहर मोर गौरा गौरी“ । |
आवाज की तकनीकी विशेषताएं
- पिच (Pitch): ममता की आवाज में स्वाभाविक रूप से उच्च तारत्व (High Pitch) है, जो लोक गीतों के लिए आवश्यक है ताकि आवाज खुले मैदानों में दूर तक जा सके।
- भाव प्रवणता (Emotive Quality): उनकी आवाज में एक विशेष प्रकार का ‘दर्द’ या ‘कसक’ है। जब वे विदाई गीत गाती हैं, तो श्रोता भावुक हुए बिना नहीं रह पाते।
- उच्चारण: उनका उच्चारण मानक छत्तीसगढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। नए गायकों के लिए उनकी गायकी एक पाठ्यपुस्तक (Textbook) के समान है।
सह-कलाकार और जुगलबंदी
ममता चंद्राकर ने स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के कई कलाकारों के साथ काम किया है:
- सोनू निगम: गीत “मैं होगे दीवानी रे“ ने यह साबित किया कि उनकी आवाज बॉलीवुड के शीर्ष गायकों के साथ भी उतनी ही प्रभावशाली लगती है।
- उदित नारायण: गीत “का तैं जादू करे“ और “हल्लू हल्लू कर के हंसे” अत्यंत लोकप्रिय रहे।
- सुनील सोनी: उनके साथ गाए युगल गीत छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।
ममता चंद्राकर के प्रमुख गीत और उनका सांस्कृतिक प्रभाव
ममता चंद्राकर के कुछ गीतों ने केवल लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि ‘कल्ट स्टेटस’ प्राप्त किया है।
“अरपा पैरी के धार” (राज्य गीत)
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा द्वारा लिखित इस गीत को ममता चंद्राकर ने अपनी आवाज दी।
- महत्व: यह गीत छत्तीसगढ़ की भौगोलिक और आध्यात्मिक पहचान है। इसमें अरपा, पैरी, महानदी और इंद्रावती नदियों का उल्लेख है।
- आधिकारिक दर्जा: 2019 में छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे आधिकारिक राज्य गीत (State Song) घोषित किया। ममता चंद्राकर द्वारा गाया गया संस्करण ही आधिकारिक कार्यक्रमों में बजाया जाता है।
“तोर मन कैसे लागे राजा”
यह एक दादरिया गीत है जो प्रेम की अनिश्चितता और छेड़छाड़ को व्यक्त करता है। इसमें उनकी बेटी पूर्वी चंद्राकर ने भी साथ दिया है। यह गीत पीढ़ियों के बीच के संवाद का प्रतीक है।
“माटी ला छोड़ झन जाना”
यह गीत पलायन (Migration) की पीड़ा को दर्शाता है। छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में मजदूर काम की तलाश में अन्य राज्यों में जाते हैं। यह गीत उन्हें अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों से जुड़े रहने का मार्मिक आह्वान करता है। यह गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है।
डिस्कोग्राफी (चयनित हिट गीत)
| गीत का नाम | विधा/शैली | सहयोगी कलाकार |
| अरपा पैरी के धार | राज्य गीत | (सोलो) |
| तोर मन कैसे लागे राजा | दादरिया | पूर्वी चंद्राकर |
| मैं होगे दीवानी रे | रोमांटिक | सोनू निगम |
| का तैं जादू करे | फिल्मी/लोक | उदित नारायण |
| माटी ला छोड़ झन जाना | विदाई/विरह | सुनील सोनी |
| कर्मा नाचे ला जाबो | कर्मा नृत्य | आकाश चंद्राकर |
| सास गारी देथे | हास्य/सामाजिक | – |
ममता चंद्राकर के पुरस्कार और राष्ट्रीय सम्मान
ममता चंद्राकर की कला साधना को राष्ट्र ने सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत किया है।
पद्मश्री (2016)
2016 में भारत सरकार ने उन्हें कला के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया ।
- समारोह: 12 अप्रैल 2016 को राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।
- महत्व: यह सम्मान केवल ममता का नहीं, बल्कि उन हजारों लोक कलाकारों का था जो गांवों में अपनी कला को जीवित रखे हुए हैं। यह ‘सोनहा बिहान‘ और ‘चिन्हारी‘ की जीत थी।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2019/2023)
- घोषणा/वितरण: संगीत नाटक अकादमी ने 2019 के लिए उन्हें पुरस्कार देने की घोषणा की, जिसका वितरण 23 फरवरी 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा किया गया ।
- श्रेणी: लोक संगीत (Folk Music) में उनके समग्र योगदान के लिए।
- विवरण: पुरस्कार में एक ताम्रपत्र, अंगवस्त्रम और 1,00,000 रुपये की नकद राशि शामिल थी।

अन्य सम्मान
- मानद डी.लिट (Honorary D.Litt): इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय द्वारा 2023 में प्रदान की गई I
- छत्तीसगढ़ विभूति अलंकरण (2019)
- छत्तीसगढ़ रत्न (2013)
- दाऊ दुलर सिंह मंदराजी सम्मान (2012): यह सम्मान उनके पिता के समकालीन और लोक कला के पुरोधा मंदराजी दाऊ की स्मृति में दिया जाता है, जो उनके लिए अत्यंत भावुक क्षण था ।
प्रमुख सम्मान और पुरस्कार
| वर्ष | सम्मान | प्रदाता संस्था |
| 2016 | पद्मश्री | भारत सरकार (राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी) |
| 2019/23 | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार | संगीत नाटक अकादमी (राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू) |
| 2023 | मानद डी.लिट (D.Litt) | इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय |
| 2019 | छत्तीसगढ़ विभूति अलंकरण | छत्तीसगढ़ सरकार |
| 2013 | छत्तीसगढ़ रत्न | नागरिक सम्मान |
| 2012 | दाऊ दुलर सिंह मंदराजी सम्मान | संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ |
ममता चंद्राकर की प्रशासनिक कार्यकाल: इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की कुलपति (2020-2024)
ममता चंद्राकर का जीवन तब एक नया मोड़ ले लिया जब उन्होंने एक कलाकार से प्रशासक की भूमिका में कदम रखा। यह अध्याय उनके कुलपति काल और उसके विवादित अंत का विस्तृत विश्लेषण करता है।
नियुक्ति और विजन (2020)
2020 में, छत्तीसगढ़ की तत्कालीन कांग्रेस सरकार (मुख्यमंत्री भूपेश बघेल) की अनुशंसा पर राज्यपाल अनुसुइया उइके ने ममता चंद्राकर को इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ का कुलपति (Vice-Chancellor) नियुक्त किया ।
- ऐतिहासिकता: यह पहली बार था जब राज्य की कोई लोक कलाकार, जो उसी विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा भी थी, सर्वोच्च पद पर आसीन हुई।
- विजन: उनका उद्देश्य विश्वविद्यालय को केवल अकादमिक डिग्री का केंद्र न बनाकर उसे छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं के शोध और संरक्षण का केंद्र बनाना था।
कार्यकाल की उपलब्धियां
कोविड-19 महामारी के दौरान कार्यभार संभालने के बावजूद, उन्होंने ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा दिया। उन्होंने विश्वविद्यालय में नए प्रदर्शनकारी कला पाठ्यक्रमों (Performing Arts Courses) की शुरुआत की और स्थानीय कलाकारों को विश्वविद्यालय से जोड़ने का प्रयास किया।
विवाद और 2024 में बर्खास्तगी
जून 2024 में, राज्य में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन (भाजपा सरकार का आगमन) के कुछ समय बाद, ममता चंद्राकर को उनके पद से हटा दिया गया। यह घटनाक्रम अत्यंत नाटकीय और विवादास्पद रहा।
बर्खास्तगी का विवरण
- तिथि: 21 जून 2024।
- आदेश: राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन (जो कुलाधिपति भी थे) ने विश्वविद्यालय अधिनियम 1956 की धारा 17-ए (Section 17-A) का उपयोग करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से पदमुक्त कर दिया ।
- अंतरिम व्यवस्था: दुर्ग संभाग के आयुक्त सत्यनारायण राठौर को कुलपति का प्रभार सौंपा गया।
विवाद के मुख्य बिंदु
शोध और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस कठोर कार्रवाई के पीछे कई कारण थे:
- योग्यता पर प्रश्न: सबसे बड़ा आरोप यह था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के अनुसार कुलपति बनने के लिए “10 वर्षों का प्राध्यापक (Professor) के रूप में अकादमिक अनुभव” आवश्यक है, जो ममता चंद्राकर के पास नहीं था। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक बी.आर. यादव ने इसके खिलाफ लंबा सत्याग्रह किया था।
- राजभवन के आदेशों की अवहेलना: उन पर आरोप लगा कि उन्होंने राजभवन (Governor’s House) के निर्देशों का पालन नहीं किया। उदाहरण के लिए, पूर्व कुलपति डॉ. मांडवी सिंह के अवकाश आवेदन को कथित तौर पर मनमाने ढंग से नामंजूर करना और राजभवन के पत्रों का उत्तर न देना।
- जनविरोध: खैरागढ़ के स्थानीय निवासियों ने उनकी नियुक्ति और कार्यशैली के विरोध में ‘खैरागढ़ बंद‘ और ‘मशाल रैलियां‘ आयोजित की थीं।
विश्लेषण
यह प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि कलात्मक उत्कृष्टता और प्रशासनिक योग्यता दो अलग-अलग क्षेत्र हैं। जहाँ एक ओर ममता चंद्राकर की कलात्मक योग्यता निर्विवाद है, वहीं दूसरी ओर अकादमिक प्रशासन के तकनीकी नियमों (Technicalities) ने उनके कार्यकाल को समय से पहले समाप्त कर दिया। यह घटनाक्रम राज्य में कला और राजनीति के जटिल संबंधों को भी उजागर करता है।
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ममता चंद्राकर की व्यक्तिगत जीवन और विचारधारा
परिवार
ममता चंद्राकर का परिवार पूरी तरह से संगीत को समर्पित है।
- पति: प्रेम चंद्राकर न केवल उनके जीवनसाथी हैं, बल्कि उनके कलात्मक मेंटर और निर्माता भी हैं। छॉलीवुड में उनकी फिल्मों ने व्यावसायिक सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं ।
- पुत्री: पूर्वी चंद्राकर ने अपनी माँ की विरासत को बखूबी संभाला है। वे अक्सर ममता जी के साथ मंच साझा करती हैं और नई पीढ़ी के संगीत में सक्रिय हैं ।
- भाई-बहन: उनके भाई डॉ. बी.एल. चंद्राकर और बहन प्रमिला चंद्राकर भी कला और साहित्य जगत से जुड़े हैं।
विचारधारा और सामाजिक सरोकार
ममता चंद्राकर का मानना है कि लोक संगीत में ‘फ्यूजन’ (Fusion) का प्रयोग बहुत सावधानी से होना चाहिए। वे वाद्ययंत्रों की शुद्धता की पक्षधर हैं।
- मतदाता जागरूकता: राज्य निर्वाचन आयोग ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें ‘स्टेट आइकन‘ (State Icon) नियुक्त किया था ताकि वे गीतों के माध्यम से मतदाताओं को जागरूक कर सकें 6।
- नारी सशक्तिकरण: उनके कई गीत, विशेषकर सुआ गीत, महिलाओं की व्यथा और शक्ति को प्रदर्शित करते हैं। वे मानती हैं कि लोक कला महिलाओं की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है।
निष्कर्ष – एक अमिट विरासत
ममता चंद्राकर की कहानी एक छोटी सी बच्ची ‘मोक्षदा‘ के ‘पद्मश्री ममता‘ बनने की अद्भुत यात्रा है। उन्होंने उस समय लोक संगीत की मशाल थामी जब वैश्वीकरण की आंधी में स्थानीय संस्कृतियां विलुप्त हो रही थीं।
विरासत (Legacy)
- सांस्कृतिक संरक्षण: उन्होंने सैकड़ों ऐसे लोक गीतों को रिकॉर्ड किया जो अन्यथा मौखिक परंपरा (Oral Tradition) के साथ लुप्त हो जाते।
- संस्थागत प्रभाव: ‘चिन्हारी‘ के माध्यम से उन्होंने लोक कलाकारों को रोजगार और सम्मानजनक जीवन जीने का मार्ग दिखाया।
- पहचान: उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को हीनता बोध (Inferiority Complex) से निकालकर गौरव का विषय बनाया। आज युवा गर्व से छत्तीसगढ़ी गीत गाते हैं, जिसका श्रेय काफी हद तक ममता चंद्राकर को जाता है।
भविष्य की दिशा
यद्यपि उनका प्रशासनिक करियर विवादों में रहा, लेकिन इतिहास उन्हें एक कुलपति के रूप में कम और उस ‘स्वर कोकिला‘ के रूप में अधिक याद रखेगा जिसने अरपा और पैरी की धाराओं को अमर कर दिया। उनकी आवाज आने वाली कई पीढ़ियों तक छत्तीसगढ़ के खेतों, खलिहानों और आंगन में गूंजती रहेगी। ममता चंद्राकर केवल एक गायिका नहीं हैं; वे छत्तीसगढ़ की आत्मा हैं।
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यह रिपोर्ट उपलब्ध शोध सामग्री, ऐतिहासिक तथ्यों और समसामयिक समाचारों के गहन विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य ममता चंद्राकर के व्यक्तित्व और कृतित्व का एक संतुलित और विस्तृत चित्र प्रस्तुत करना है।
Refrences :
- https://dbpedia.org/page/Mamta_Chandrakar
- https://cgfilm.in/star/mamta-chandrakar/page/4/
- https://en.wikipedia.org/wiki/Mamta_Chandrakar
- https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2023/feb/doc2023223162001.pdf
ममता चंद्राकर से जुडी प्रश्नोत्तर (FAQs)
ममता चंद्राकर के जीवन, उपलब्धियों और उनसे जुड़े विवादों पर आधारित 15 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs) यहाँ दिए गए हैं:
प्रश्न 1 : ममता चंद्राकर का वास्तविक नाम क्या है?
उत्तर: उनका मूल नाम मोक्षदा चंद्राकर है I
प्रश्न 2 : ममता चंद्राकर को “छत्तीसगढ़ की स्वर कोकिला” (Nightingale of Chhattisgarh) क्यों कहा जाता है?
उत्तर: उनकी सुरीली और मिट्टी से जुड़ी आवाज ने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत को एक नई पहचान दी है, इसी कारण उन्हें यह उपाधि दी गई है I
प्रश्न 3 : ममता चंद्राकर के पिता कौन थे और उनका क्या योगदान था?
उत्तर: उनके पिता दाऊ महासिंह चंद्राकर थे। उन्होंने “सोनहा बिहान” (Sonha Bihan) नामक संस्था के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक संगीत को पुनर्जीवित करने में अपना जीवन समर्पित किया I
प्रश्न 4 : ममता चंद्राकर को भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ सम्मान कब दिया गया?
उत्तर: उन्हें कला के क्षेत्र में योगदान के लिए 2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया I
प्रश्न 5 : ममता चंद्राकर ने संगीत की उच्च शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?
उत्तर: उन्होंने एशिया के पहले संगीत विश्वविद्यालय, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से गायन में स्नातकोत्तर (Post Graduation) की डिग्री प्राप्त की I
प्रश्न 6 : ममता चंद्राकर के पति कौन हैं और वे किस क्षेत्र से जुड़े हैं?
उत्तर: उनके पति प्रेम चंद्राकर हैं, जो छत्तीसगढ़ी सिनेमा (छॉलीवुड) के एक प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक हैं I
प्रश्न 7 : ‘चिन्हारी’ (Chinhari) क्या है और इससे ममता चंद्राकर का क्या संबंध है?
उत्तर: ‘चिन्हारी’ एक लोक कला मंच (Troupe) है, जिसकी स्थापना ममता चंद्राकर और उनके पति ने लोक गीतों और नाचा-गम्मत को बढ़ावा देने के लिए की थी I
प्रश्न 8 : ममता चंद्राकर के कुछ सबसे प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गीतों के नाम क्या हैं?
उत्तर: उनके प्रमुख गीतों में “अरपा पैरी के धार” (राज्य गीत), “तोर मन कैसे लागे राजा”, “मैं होगे दीवानी रे”, और “माटी ला छोड़ झन जाना” शामिल हैं I
प्रश्न 9 : ममता चंद्राकर को इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के कुलपति (VC) पद से कब हटाया गया?
उत्तर: उन्हें 21 जून 2024 को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल द्वारा तत्काल प्रभाव से पदमुक्त कर दिया गया I
प्रश्न 10 : ममता चंद्राकर को कुलपति पद से हटाए जाने का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: उन पर विश्वविद्यालय अधिनियम की अवहेलना, राजभवन के निर्देशों का पालन न करने और पद के लिए आवश्यक अकादमिक अनुभव (10 वर्ष का प्रोफेसर अनुभव) न होने के आरोप थे I
प्रश्न 11 : ममता चंद्राकर को ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ किस वर्ष मिला?
उत्तर: उन्हें वर्ष 2019 के लिए अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा हुई थी, जिसे उन्होंने फरवरी 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से प्राप्त किया I
प्रश्न 12 : ममता चंद्राकर का भारत रत्न लता मंगेशकर से क्या विशेष संस्मरण है?
उत्तर: 1980 में जब लता मंगेशकर को खैरागढ़ विश्वविद्यालय में डी.लिट की उपाधि मिली थी, तब ममता चंद्राकर वहां एक छात्रा थीं और उन्होंने अतिथियों को भोजन परोसने वाले दल में काम किया था I
प्रश्न 13 : ममता चंद्राकर ने अपने करियर की शुरुआत कहाँ से की थी?
उत्तर: उन्होंने 1977 में आकाशवाणी रायपुर (All India Radio) से लोक गायिका के रूप में अपना पेशेवर करियर शुरू किया और बाद में वहां सहायक निदेशक भी बनीं I
प्रश्न 14 : ममता चंद्राकर की बेटी का क्या नाम है?
उत्तर: उनकी बेटी का नाम पूर्वी चंद्राकर है, जो स्वयं भी एक गायिका हैं और अपनी माँ के साथ मंच साझा करती हैं I
प्रश्न 15 : पद्मश्री के अलावा उन्हें राज्य स्तर के कौन से प्रमुख सम्मान मिले हैं?
उत्तर: उन्हें ‘छत्तीसगढ़ विभूति अलंकरण’ (2019), ‘छत्तीसगढ़ रत्न’ (2013) और ‘दाऊ दुलर सिंह मंदराजी सम्मान’ (2012) से नवाजा गया है I










